आज सोशल मीडिया पर ‘Get Ready With Me’ और स्किनकेयर रूटीन वाले वीडियो बच्चों और किशोरों के बीच तेजी से लोकप्रिय हो रहे हैं। कई बार इन वीडियो को देखकर कम उम्र के बच्चे भी रेटिनॉल, एक्सफोलिएटिंग एसिड और एंटी-एजिंग जैसे उत्पादों का इस्तेमाल शुरू कर देते हैं।
विशेषज्ञों के अनुसार, स्किनकेयर अपने आप में कोई समस्या नहीं है, लेकिन जब बेदाग या परफेक्ट त्वचा पाने की चिंता जरूरत से ज्यादा बढ़ जाए और व्यक्ति अपनी दिनचर्या, खर्च और मानसिक स्थिति को उसी के हिसाब से नियंत्रित करने लगे, तो यह चिंता का विषय बन सकता है।
इसी संदर्भ में ‘कॉस्मेटिकोरैक्सिया’ शब्द का इस्तेमाल अत्यधिक या बाध्यकारी स्किनकेयर और परफेक्ट त्वचा पाने की चिंता के लिए किया जाता है। इसे कभी-कभी ‘डर्मोरेक्सिया’ भी कहा जाता है। हालांकि, यह स्पष्ट करना जरूरी है कि कॉस्मेटिकोरैक्सिया फिलहाल कोई मान्यता प्राप्त चिकित्सकीय या मानसिक स्वास्थ्य निदान नहीं है। इस अवधारणा को परिभाषित करने वाला अकादमिक आधार भी अभी सीमित है। इसलिए लंबे स्किनकेयर रूटीन को सीधे मानसिक स्वास्थ्य समस्या मानना सही नहीं होगा।
सोशल मीडिया के प्रभाव को लेकर चिंता इसलिए बढ़ी है क्योंकि बच्चों और किशोरों को कम उम्र में ही जटिल स्किनकेयर रूटीन और बढ़ती उम्र रोकने वाले उत्पादों के प्रचार का सामना करना पड़ रहा है। 2025 में प्रकाशित एक अध्ययन में 7 से 18 वर्ष की उम्र के बच्चों और किशोरों द्वारा बनाए गए 100 TikTok स्किनकेयर वीडियो का विश्लेषण किया गया।
इन रूटीन में औसतन छह उत्पाद शामिल थे और इनकी औसत लागत 168 अमेरिकी डॉलर थी। दिन में इस्तेमाल किए जाने वाले रूटीन वाले वीडियो में केवल 26.2 प्रतिशत में सनस्क्रीन शामिल था। अध्ययन में यह भी पाया गया कि सबसे ज्यादा देखे गए वीडियो में कई संभावित रूप से जलन पैदा करने वाले एक्टिव इंग्रीडिएंट मौजूद थे। कुछ वीडियो में एक ही तरह के एक्टिव इंग्रीडिएंट अलग-अलग उत्पादों के माध्यम से बार-बार इस्तेमाल किए जा रहे थे।
इससे त्वचा में जलन, सन सेंसिटिविटी और एलर्जिक कॉन्टैक्ट डर्मेटाइटिस जैसी समस्याओं का खतरा बढ़ सकता है। शोधकर्ताओं ने यह भी पाया कि कई रूटीन बच्चों की उम्र के हिसाब से आवश्यक नहीं थे और उनसे मिलने वाला लाभ सीमित हो सकता है।
कम उम्र में रेटिनॉइड, एक्सफोलिएटिंग एसिड और दूसरे एक्टिव उत्पादों को एक साथ इस्तेमाल करना त्वचा की प्राकृतिक सुरक्षा परत को प्रभावित कर सकता है। इससे लालिमा, सूजन, जलन, धूप के प्रति संवेदनशीलता और एलर्जी जैसी समस्याएं हो सकती हैं। खासकर तब जोखिम बढ़ सकता है जब व्यक्ति अलग-अलग उत्पादों में मौजूद समान एक्टिव सामग्री को अनजाने में कई बार इस्तेमाल कर रहा हो।
मामला केवल त्वचा तक सीमित नहीं है। सोशल मीडिया पर लगातार दूसरे लोगों की त्वचा और चेहरे से अपनी तुलना करने से शरीर की छवि को लेकर असंतोष बढ़ सकता है। हालांकि, इसका यह मतलब नहीं है कि सोशल मीडिया अकेले कॉस्मेटिकोरैक्सिया जैसी समस्या पैदा करता है। पूर्णतावाद, चिंता, पहले से मौजूद त्वचा संबंधी समस्याएं, बुलिंग, परिवार का रवैया, विज्ञापन और समाज में सुंदरता को लेकर बने मानक भी व्यक्ति के व्यवहार को प्रभावित कर सकते हैं।
किसी व्यक्ति की बाथरूम अलमारी में रखे स्किनकेयर उत्पादों की संख्या से यह तय नहीं किया जा
सकता कि उसे कोई मानसिक स्वास्थ्य समस्या है। लेकिन कुछ व्यवहार चेतावनी संकेत हो सकते हैं। इनमें स्किनकेयर पर लगातार बढ़ता समय और पैसा खर्च करना, रूटीन पूरा न होने पर अत्यधिक बेचैनी महसूस करना, उत्पाद उपलब्ध न होने पर चिंता या चिड़चिड़ापन, बार-बार आईने में त्वचा की जांच करना, लगातार तस्वीरें लेना या त्वचा को छिपाने की कोशिश करना और त्वचा को लेकर चिंता के कारण स्कूल, काम या सामाजिक गतिविधियों से दूरी बनाना शामिल हो सकता है।
अगर किसी बच्चे या किशोर में ऐसे संकेत दिखाई देते हैं तो हर उत्पाद पर अचानक रोक लगाने के बजाय बातचीत करना ज्यादा उपयोगी हो सकता है। माता-पिता यह समझने की कोशिश कर सकते हैं कि बच्चा किन बदलावों की उम्मीद कर रहा है, उसे स्किनकेयर की जानकारी कहां से मिली और रूटीन छूट जाने पर उसे कैसा महसूस होता है। बच्चों को यह समझाना भी जरूरी है कि सोशल मीडिया पर फिल्टर और एडिट की गई तस्वीरें त्वचा को लेकर अवास्तविक उम्मीदें पैदा कर सकती हैं। रोमछिद्र, त्वचा की बनावट और मुंहासे सामान्य मानवीय विशेषताएं हैं।
स्किनकेयर को सरल रखना भी महत्वपूर्ण है। यदि किसी बच्चे को त्वचा संबंधी वास्तविक समस्या है तो फार्मासिस्ट, डॉक्टर या त्वचा विशेषज्ञ से सलाह लेकर उम्र और त्वचा की जरूरत के अनुसार रूटीन तय किया जा सकता है। यदि त्वचा को लेकर चिंता इतनी बढ़ जाए कि पढ़ाई, काम, सामाजिक जीवन या रोजमर्रा की गतिविधियां प्रभावित होने लगें, या व्यक्ति बार-बार त्वचा की जांच करने और उसे छिपाने के व्यवहार में फंस जाए, तो डॉक्टर या मानसिक स्वास्थ्य विशेषज्ञ से सलाह लेना उचित है।
आखिरकार, स्किनकेयर खुद कोई समस्या नहीं है। समस्या तब शुरू हो सकती है जब त्वचा की देखभाल इस धारणा में बदल जाए कि स्वीकार्य, सुंदर या आत्मविश्वासी महसूस करने के लिए त्वचा का पूरी तरह परफेक्ट होना जरूरी है। सोशल मीडिया के दौर में बच्चों और युवाओं को त्वचा की देखभाल के साथ-साथ यह समझाना भी जरूरी है कि स्वस्थ त्वचा और ‘परफेक्ट त्वचा’ एक ही चीज नहीं हैं।