लखनऊ, इलाहाबाद हाईकोर्ट की लखनऊ पीठ ने नोएडा की वर्ष 2006 की आवासीय प्लॉट योजना से जुड़े करीब दो दशक पुराने मामले में महत्वपूर्ण फैसला सुनाया है। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि किसी सार्वजनिक योजना की प्रक्रिया शुरू होने के बाद ऐसी नई शर्त लागू नहीं की जा सकती, जो योजना की मूल शर्तों में शामिल ही नहीं थी।
अदालत ने इसी सिद्धांत को रेखांकित करते हुए कहा कि “खेल शुरू होने के बाद नियम नहीं बदले जा सकते।” मामले में याचिकाकर्ता की ओर से अधिवक्ता अनुराग सिंह और अभिनव श्रीवास्तव उपस्थित हुए।
मामला M/S Nalini Khandelwal बनाम राज्य उत्तर प्रदेश एवं अन्य से संबंधित है। याचिकाकर्ता ने 16 जून 2006 को नोएडा की आवासीय प्लॉट योजना के तहत सेक्टर-100 में औद्योगिक आरक्षित श्रेणी के प्लॉट के लिए आवेदन किया था। आवेदन के साथ निर्धारित धनराशि और योजना में मांगे गए आवश्यक दस्तावेज भी जमा किए गए थे।
आवेदन की जांच के दौरान पहले अलग आधार पर पात्रता पर सवाल उठाया गया। बाद में 10 सितंबर 2012 को नोएडा प्राधिकरण ने यह कहते हुए आवेदन पर प्रतिकूल निर्णय लिया कि मूल आवेदन के साथ फॉर्म-32 प्रस्तुत नहीं किया गया था। इसके बाद 17 मार्च 2017 को पुनरीक्षण स्तर पर भी इसी आधार को बरकरार रखा गया।
याचिकाकर्ता की ओर से दलील दी गई कि वर्ष 2006 में जब आवेदन मांगे गए थे, तब योजना की पुस्तिका में फॉर्म-32 को अनिवार्य दस्तावेज के रूप में निर्धारित नहीं किया गया था। ऐसे में आवेदन जमा होने के बाद किसी नए दस्तावेज को अनिवार्य शर्त बनाकर पात्रता से इनकार करना उचित नहीं है।
हाईकोर्ट ने माना कि प्राधिकरण को आवेदक द्वारा प्रस्तुत दस्तावेजों की जांच और सत्यापन करने का अधिकार है, लेकिन इस अधिकार के आधार पर ऐसी नई पात्रता या दस्तावेजी शर्त नहीं जोड़ी जा सकती, जो योजना में पहले से निर्धारित नहीं थी। कोर्ट ने कहा कि सार्वजनिक योजना में आवेदन आमंत्रित करते समय जो नियम और शर्तें घोषित की जाती हैं, प्रशासन को उन्हीं के अनुरूप प्रक्रिया आगे बढ़ानी होती है।
अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि केवल आवेदन करने से आवेदक को स्वतः प्लॉट पाने का असीमित अधिकार नहीं मिल जाता, लेकिन इसका मतलब यह भी नहीं है कि प्राधिकरण बाद में अपनी सुविधा के अनुसार नई शर्तें लागू कर दे। कोर्ट के अनुसार जांच और सत्यापन की शक्ति को ऐसी नई पात्रता शर्त बनाने की शक्ति के रूप में इस्तेमाल नहीं किया जा सकता।
हाईकोर्ट ने वर्ष 2012 के नोएडा प्राधिकरण के आदेश और 17 मार्च 2017 के पुनरीक्षण आदेश को निरस्त कर दिया। साथ ही अधिकारियों को निर्देश दिया कि याचिकाकर्ता के 16 जून 2006 के मूल आवेदन पर उसी मूल योजना के तहत नए सिरे से कार्रवाई की जाए।
कोर्ट ने विशेष रूप से निर्देश दिया कि फॉर्म-32 को अनिवार्य शर्त मानकर आवेदन खारिज नहीं किया जाएगा। यदि वर्ष 2006 की योजना के तहत मूल प्लॉट उपलब्ध है तो उसी श्रेणी का प्लॉट उस समय की मूल दर पर देने पर विचार किया जाए। इसके लिए पहले से जमा धनराशि को समायोजित किया जाएगा।
यदि मूल प्लॉट वास्तविक रूप से उपलब्ध नहीं है तो उसी प्रकार, श्रेणी और आकार का वैकल्पिक आवासीय प्लॉट देने पर विचार करने का निर्देश दिया गया है। इसके लिए प्राथमिकता सेक्टर-100 नोएडा या तुलनीय स्थान को दी गई है। अदालत ने यह भी कहा कि केवल समय बीत जाने के कारण याचिकाकर्ता पर वर्तमान या बढ़ी हुई दर का अतिरिक्त आर्थिक बोझ नहीं डाला जाएगा।
अदालत ने अधिकारियों को निर्देश दिया कि मूल योजना के अनुरूप आवश्यक सत्यापन पूरा करते हुए कार्रवाई की जाए और फॉर्म-32 की अनुपस्थिति या वर्ष 2006 में बाद में सामने आए कटऑफ संबंधी आधार पर आवेदन को फिर से खारिज न किया जाए। पूरी प्रक्रिया प्रमाणित आदेश की प्रति प्रस्तुत किए जाने के बाद अधिमानतः आठ सप्ताह के भीतर पूरी करने को कहा गया है।
इस फैसले में हाईकोर्ट ने प्रशासनिक प्रक्रिया में निष्पक्षता और पारदर्शिता के महत्व को भी रेखांकित किया। अदालत ने स्पष्ट किया कि किसी सार्वजनिक योजना की प्रक्रिया शुरू होने के बाद उसके घोषित नियमों को बदलकर आवेदक को नुकसान नहीं पहुंचाया जा सकता।
“खेल शुरू होने के बाद नियम नहीं बदले जा सकते” का सिद्धांत केवल भर्ती प्रक्रिया तक सीमित नहीं है, बल्कि प्रशासनिक निर्णयों में मनमाने बदलाव के खिलाफ निष्पक्षता के व्यापक सिद्धांत से जुड़ा है।