क्या आप तार्किक हैं, बारीकियों पर ध्यान देते हैं या गणित में अच्छे हैं? तो संभव है कि आपको ‘लेफ्ट-ब्रेन’ वाला कहा जाए। वहीं, रचनात्मक, कलात्मक और सहज-बोध वाले लोगों को अक्सर ‘राइट-ब्रेन’ वाला माना जाता है।
हालांकि वैज्ञानिक शोध इस लोकप्रिय धारणा का समर्थन नहीं करता कि किसी व्यक्ति का व्यक्तित्व या रचनात्मकता मुख्य रूप से मस्तिष्क के एक हिस्से पर निर्भर करती है, लेकिन इस पर बहस भी नहीं थमती।
यह विचार लंबे समय से रहा है कि कुछ लोगों के मस्तिष्क का बायां हिस्सा अधिक प्रभावी होता है, जबकि कुछ लोगों का दायां हिस्सा। माना जाता है कि यही अंतर उनकी सोचने की शैली और व्यक्तित्व को तय करता है।
लेकिन इस धारणा की शुरुआत मस्तिष्क के दोनों हिस्सों के वास्तविक अंतर से हुई थी। 1860 के दशक में फ्रांसीसी चिकित्सक पॉल ब्रॉका ने पाया कि बोलने की क्षमता मुख्य रूप से मस्तिष्क के बाएं हिस्से से जुड़ी है। इससे पहली बार यह संकेत मिला कि मस्तिष्क के दोनों हिस्सों की अलग-अलग भूमिकाएं हो सकती हैं।
करीब एक सदी बाद नोबेल पुरस्कार विजेता रोजर स्पेरी और उनकी टीम ने मिर्गी के इलाज के लिए मस्तिष्क के दोनों हिस्सों को जोड़ने वाले तंत्रिका तंतुओं को अलग किए गए मरीजों का अध्ययन किया। इससे शोधकर्ताओं को दोनों हिस्सों के कार्यों को अलग-अलग समझने का अवसर मिला।
अध्ययनों से पता चला कि बायां हिस्सा भाषा जैसे कार्यों में अधिक विशेषज्ञ है, जबकि दायां हिस्सा भावनात्मक और गैर-मौखिक सूचनाओं के प्रसंस्करण में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। मस्तिष्क के कार्यों का इस तरह अलग-अलग हिस्सों में केंद्रित होना केवल इंसानों तक सीमित नहीं है। कई अन्य स्तनधारियों, पक्षियों, मछलियों और कीटों में भी इस तरह का विभाजन पाया जाता है।
वैज्ञानिकों का मानना है कि विकास की प्रक्रिया में मस्तिष्क के अलग-अलग हिस्सों का कुछ कार्यों में विशेषज्ञ होना उपयोगी रहा होगा। इससे जीव एक ही समय में अलग-अलग काम कर सकते थे, जैसे भोजन तलाशते समय संभावित शिकारी पर नजर रखना।
समस्या तब शुरू हुई जब मस्तिष्क के कुछ कार्यों के एक हिस्से में अधिक केंद्रित होने की वैज्ञानिक जानकारी को इस सरल धारणा में बदल दिया गया कि कुछ लोग पूरी तरह ‘लेफ्ट-ब्रेन’ और कुछ ‘राइट-ब्रेन’ वाले होते हैं।
1,000 से ज्यादा एमआरआई से मिली तस्वीर
2013 में शोधकर्ताओं ने इस धारणा की जांच के लिए 1,000 से अधिक लोगों के एमआरआई स्कैन का अध्ययन किया और मस्तिष्क के 7,000 से ज्यादा क्षेत्रों का विश्लेषण किया।
शोधकर्ताओं ने पाया कि भाषा और ध्यान जैसे कुछ कार्य वास्तव में मस्तिष्क के विशेष हिस्सों में अधिक केंद्रित होते हैं। लेकिन ऐसा कोई प्रमाण नहीं मिला कि अलग-अलग व्यक्तित्व या कौशल वाले लोगों का पूरा मस्तिष्क एक ही तरफ अधिक सक्रिय रहता है।
कहने का तात्पर्य है कि किसी व्यक्ति के भाषा संबंधी कौशल का बाएं हिस्से से अधिक जुड़ा होना इस बात का संकेत नहीं है कि उसके दूसरे कौशल या व्यक्तित्व संबंधी विशेषताएं दाएं हिस्से से संचालित होंगी।
रचनात्मकता को लेकर किए गए अध्ययनों में भी यही तस्वीर सामने आई। रचनात्मक सोच को केवल मस्तिष्क के दाएं हिस्से की विशेषता नहीं पाया गया। इसके लिए दोनों हिस्सों में फैले मस्तिष्क के व्यापक नेटवर्क की गतिविधि जरूरी होती है।
हालांकि, शोध में यह जरूर सामने आया है कि किसी विशेष कार्य को नियंत्रित करने में मस्तिष्क का कोई एक हिस्सा जितना अधिक विशेषज्ञ होता है, उस कार्य में व्यक्ति का प्रदर्शन उतना बेहतर हो सकता है। उदाहरण के लिए, जिन लोगों में भाषा संबंधी गतिविधियां बाएं हिस्से में अधिक केंद्रित होती हैं, वे भाषा संबंधी कार्यों में बेहतर प्रदर्शन कर सकते हैं।
इसलिए ‘लेफ्ट-ब्रेन’ और ‘राइट-ब्रेन’ की अवधारणा पूरी तरह गलत नहीं है। मस्तिष्क के दोनों हिस्सों के बीच कार्यों का कुछ हद तक विभाजन वास्तविक है, लेकिन इसे लोगों के व्यक्तित्व और सोचने की शैली के बारे में व्यापक निष्कर्ष निकालने तक बढ़ाना वैज्ञानिक रूप से सही नहीं है।
इस मिथक के लोकप्रिय होने की एक वजह यह हो सकती है कि लोग अपने बारे में सामान्य व्यक्तित्व विवरणों को सटीक मान लेते हैं। ऐसा इसलिए, क्योंकि उन्हें बताया जाता है कि वे विवरण खास तौर पर उन पर लागू होते हैं। इसके बाद लोग उन व्यवहारों पर अधिक ध्यान देने लगते हैं जो उस धारणा की पुष्टि करते हैं।
वास्तव में, तर्क और रचनात्मकता सहित हमारे अधिकतर जटिल कार्यों में मस्तिष्क के दोनों हिस्से एक-दूसरे के साथ मिलकर काम करते हैं। इसलिए किसी व्यक्ति को केवल ‘लेफ्ट-ब्रेन’ या ‘राइट-ब्रेन’ वाला बताकर उसकी सोच या रचनात्मकता को समझना वैज्ञानिक रूप से उचित नहीं है।