नई दिल्ली, मूत्र मार्ग का संक्रमण यानी यूटीआई (Urinary Tract Infection) दुनिया भर में बड़ी संख्या में लोगों को प्रभावित करता है। एंटीबायोटिक दवा लेने के बाद अक्सर जलन, बार-बार पेशाब आने और असहजता जैसे लक्षण कुछ समय के लिए ठीक हो जाते हैं, लेकिन कई लोगों में संक्रमण कुछ हफ्तों या महीनों बाद दोबारा लौट आता है।
नए शोध से संकेत मिला है कि बार-बार होने वाले यूटीआई की एक वजह मूत्राशय की अंदरूनी परतों में छिपे बैक्टीरिया भी हो सकते हैं।
वैश्विक आंकड़ों के मुताबिक, हर साल दुनिया में 40 करोड़ से अधिक लोग यूटीआई से प्रभावित होते हैं। वयस्क महिलाओं में इसका जोखिम विशेष रूप से अधिक पाया जाता है। अध्ययनों के अनुसार, आधी से अधिक महिलाओं को जीवन में कम से कम एक बार यूटीआई हो सकता है और इनमें से करीब एक-चौथाई महिलाओं में छह महीने के भीतर संक्रमण दोबारा होने की संभावना रहती है।
यूटीआई के ज्यादातर मामलों के लिए ई. कोलाई (E. coli) नामक बैक्टीरिया जिम्मेदार होता है। यह बैक्टीरिया सामान्य तौर पर आंतों में मौजूद रहता है और वहां नुकसान नहीं पहुंचाता। समस्या तब शुरू होती है, जब यह मूत्रमार्ग के रास्ते मूत्राशय तक पहुंच जाता है और संक्रमण पैदा करता है।
बार-बार होने वाला यूटीआई हमेशा एक ही वजह से नहीं होता। कई बार आंतों से नए बैक्टीरिया दोबारा मूत्रमार्ग के रास्ते मूत्राशय तक पहुंचते हैं, जिसे दोबारा संक्रमण या ‘री-इन्फेक्शन’ कहा जाता है। लेकिन कुछ मामलों में शुरुआती संक्रमण के दौरान पहुंचे बैक्टीरिया उपचार के बावजूद शरीर में बने रह सकते हैं और बाद में दोबारा सक्रिय हो सकते हैं।
शोधकर्ताओं ने लंबे समय से पशु अध्ययनों में देखा है कि ई. कोलाई मूत्राशय की अंदरूनी परत बनाने वाली कोशिकाओं के भीतर प्रवेश कर सकता है। वहां बैक्टीरिया के ऐसे समूह बन सकते हैं, जिन्हें शरीर की प्रतिरक्षा प्रणाली और कुछ एंटीबायोटिक दवाओं से आंशिक सुरक्षा मिल जाती है। इंसानों में भी ऐसी प्रक्रिया के संकेत पहले मिल चुके हैं, लेकिन मानव मूत्राशय के अंदर इस पूरी प्रक्रिया का अध्ययन करना चुनौतीपूर्ण रहा है।
अब स्विट्जरलैंड और जर्मनी के वैज्ञानिकों ने मानव मूत्राशय की अंदरूनी परत का एक 3डी ‘मिनी-ब्लैडर’ मॉडल तैयार किया। इसे मानव मूत्राशय की कोशिकाओं से विकसित किया गया, ताकि वास्तविक मूत्राशय की कुछ परिस्थितियों को प्रयोगशाला में दोहराया जा सके।
जब शोधकर्ताओं ने इस मॉडल में ई. कोलाई का संक्रमण पैदा किया और उसके उपचार के लिए फॉस्फोमाइसिन एंटीबायोटिक का इस्तेमाल किया, तो कुछ बैक्टीरिया एक बदली हुई अस्थायी अवस्था में जीवित पाए गए। इस अवस्था में उन्होंने सामान्य कोशिका-भित्ति खो दी। चूंकि फॉस्फोमाइसिन बैक्टीरिया की कोशिका-भित्ति बनने की प्रक्रिया को प्रभावित करती है, इसलिए यह बदलाव बैक्टीरिया के बच निकलने में भूमिका निभा सकता है।
शोध के अनुसार, ऐसे बदले हुए बैक्टीरिया मूत्राशय के ऊतक की गहरी परतों में टिके रह सकते हैं। जब एंटीबायोटिक का असर खत्म हुआ या उसे हटा दिया गया, तो कुछ बैक्टीरिया फिर अपने सामान्य रूप में लौट आए और संक्रमण दोबारा शुरू करने में सक्षम हुए। इससे यह संभावना मजबूत होती है कि कुछ बार-बार होने वाले यूटीआई में संक्रमण पूरी तरह खत्म न होने के पीछे मूत्राशय के ऊतक में बैक्टीरिया का छिपे रहना एक कारण हो सकता है।
शोध में मूत्र की स्थिति से जुड़े एक अन्य महत्वपूर्ण पहलू की ओर भी संकेत मिला। लंबे समय तक मूत्र में पानी की मात्रा कम और घुले हुए पदार्थों की मात्रा अपेक्षाकृत अधिक रहने पर मूत्राशय की कोशिकाओं के बीच के जुड़ाव कमजोर हो सकते हैं। इससे मूत्राशय की अंदरूनी परत बैक्टीरिया के हमले के प्रति अधिक संवेदनशील हो सकती है और उपचार का असर भी प्रभावित हो सकता है।
महिलाओं में यूटीआई का खतरा अधिक होने के पीछे शरीर की संरचना भी एक महत्वपूर्ण कारण है। महिलाओं का मूत्रमार्ग पुरुषों की तुलना में छोटा होता है, इसलिए बैक्टीरिया को मूत्राशय तक पहुंचने के लिए कम दूरी तय करनी पड़ती है। इसके अलावा, मूत्रमार्ग का मुंह गुदा के अपेक्षाकृत करीब होता है, जहां आंतों में रहने वाले बैक्टीरिया मौजूद होते हैं।
रजोनिवृत्ति से पहले की महिलाओं में यौन गतिविधि और कुछ गर्भनिरोधक उपाय बार-बार होने वाले यूटीआई के जोखिम से जुड़े माने जाते हैं। वहीं, रजोनिवृत्ति के आसपास और उसके बाद भी जोखिम बढ़ सकता है। इस दौरान एस्ट्रोजन का स्तर कम होने से योनि और मूत्र मार्ग के ऊतकों में बदलाव होते हैं तथा सुरक्षात्मक भूमिका निभाने वाले लैक्टोबैकिलस बैक्टीरिया की संख्या कम हो सकती है।
बार-बार होने वाले यूटीआई से बचाव के लिए हर व्यक्ति के लिए एक जैसा उपाय प्रभावी नहीं होता। जिन लोगों में पानी का सेवन सामान्य से कम होता है, उनके लिए पर्याप्त मात्रा में पानी पीना मददगार हो सकता है। कुछ अध्ययनों में क्रैनबेरी उत्पादों से भी बार-बार होने वाले यूटीआई के जोखिम में कमी के संकेत मिले हैं, हालांकि अलग-अलग शोधों के परिणाम एक जैसे नहीं रहे हैं।
‘डी-मैनोज’ नामक शर्करा को भी यूटीआई से बचाव के लिए आहार अनुपूरक के रूप में इस्तेमाल किया जाता है। इसके पीछे यह विचार है कि यह कुछ ई. कोलाई बैक्टीरिया को मूत्राशय की अंदरूनी परत से चिपकने से रोक सकती है। हालांकि, किसी भी सप्लीमेंट का इस्तेमाल डॉक्टर की सलाह के अनुसार करना बेहतर है।
रजोनिवृत्ति के आसपास या उसके बाद बार-बार यूटीआई होने की स्थिति में डॉक्टर कुछ महिलाओं के लिए योनि में इस्तेमाल होने वाली एस्ट्रोजन दवा पर भी विचार कर सकते हैं। वहीं, जिन लोगों में संक्रमण लगातार दोहराता है, उनके लिए मौजूदा संक्रमण का उपचार पूरा होने के बाद डॉक्टर निवारक उपचार की संभावना पर विचार कर सकते हैं।
विशेषज्ञों के अनुसार, बार-बार यूटीआई होने पर केवल हर बार अपने स्तर पर एंटीबायोटिक लेना उचित नहीं है। संक्रमण के बार-बार लौटने की वजह पता करना जरूरी है, क्योंकि इसके पीछे नया संक्रमण, उपचार के बाद बचा हुआ बैक्टीरिया या अन्य चिकित्सकीय कारण हो सकते हैं। लगातार या बार-बार लक्षण होने पर चिकित्सकीय जांच और डॉक्टर की सलाह लेना जरूरी है।