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अनिद्रा अपने आप में एक बीमारी, जिसका अलग से इलाज किए जाने की जरूरत

ब्यूरो पब्लिकन्यूज़360 by ब्यूरो पब्लिकन्यूज़360
April 24, 2026
in Featured, देश
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अनिद्रा अपने आप में एक बीमारी, जिसका अलग से इलाज किए जाने की जरूरत

अनिद्रा यानी नींद न आने की समस्या संभवत: प्राचीनकाल से ही इनसानों को परेशान करती आ रही है, लेकिन वैज्ञानिकों ने पिछले 20 वर्षों में इसकी समझ हासिल करने की कोशिशों में काफी प्रगति की है।

आज अनिद्रा ब्रिटेन में लोगों के सामने पेश आ रही सबसे आम मानसिक समस्याओं में से एक बन गई है। इंग्लैंड में लगभग एक-तिहाई वयस्क अनिद्रा से जुड़े लक्षणों का सामना करने की बात स्वीकार करते हैं।

अनिद्रा को लेकर वैज्ञानिकों की समझ में जो सबसे बड़ा बदलाव आया है, वह यह है कि ज्यादातर मामलों में इसकी शिकायत शारीरिक या मानसिक स्वास्थ्य संबंधी किसी अन्य समस्या के कारण उभरती है।

अनिद्रा के शिकार अधिकांश लोगों को डायबिटीज, उच्च रक्तचाप, थॉयरॉयड, पेट से जुड़ी समस्याओं, लंबे समय से बरकरार दर्द, बेचैनी या अवसाद की शिकायत होती है।

अनिद्रा जब किसी दूसरी बीमारी या समस्या का नजीता होती है, तो उसे “सेकेंडरी इंसोमेनिया” कहा जाता है। यही कारण है कि पहले डॉक्टर अक्सर सिर्फ मुख्य बीमारी का इलाज करते थे और “सेकेंडरी इंसोमेनिया” का अलग से उपचार करने पर ध्यान नहीं देते थे।

हालांकि, 2000 के दशक की शुरुआत में शोध और नैदानिक अनुभव, दोनों से पता चला कि यह तरीका सही नहीं है। वैज्ञानिकों ने कहा कि कुछ मामलों में अनिद्रा की शिकायत किसी मुख्य बीमारी के उभरने से पहले से ही हो सकती है, जबकि कुछ मामलों में यह उसके ठीक होने के बाद भी लंबे समय तक बनी रह सकती है।

“प्राइमरी इंसोमेनिया” और “सेकेंडरी इंसोमेनिया” से चिकित्सकीय रूप से निपटने के तरीके में इस अंतर को त्यागना इस बात को स्वीकार करने की दिशा में एक बड़ा कदम था कि अनिद्रा अक्सर अपने आप में एक स्वतंत्र बीमारी होती है, जिसका अलग से इलाज किया जाना जरूरी है।

इसके अलावा, शोधकर्ताओं ने इस बात के पुख्ता सबूत जुटाए हैं कि अगर लोगों की नींद संबंधी समस्याओं का प्रभावी इलाज किया जाए, तो उनमें मौजूद डायबिटीज, हृदयरोग, अवसाद, मनोभ्रंश, शराब की लत, बाइपोलर डिसऑर्डर, लंबे समय से बरकरार दर्द और पोस्ट-ट्रॉमेटिक स्ट्रेस डिसऑर्डर सहित अन्य स्वास्थ्य समस्याओं के लक्षणों में भी सुधार हो सकता है।

किसे होती है शिकायत?

-पिछले दो दशक में हमें दुनियाभर से अधिक सटीक आंकड़े मिले हैं, जो यह दर्शाते हैं कि अनिद्रा की समस्या कितनी आम है। यह लगभग सभी वर्गों को प्रभावित करती है, लेकिन महिलाएं, बुजुर्ग और गरीब एवं हाशिये पर पड़े लोग इसके प्रति ज्यादा संवेदनशील होते हैं, क्योंकि उनमें अक्सर जैविक, मानसिक और सामाजिक, तीनों कारक मिलकर अनिद्रा की समस्या को जन्म देते हैं।

मिसाल के तौर पर, महिलाओं के सामने हार्मोन में बदलाव, गर्भावस्था, शिशु का जन्म, स्तनपान, रजोनिवृत्ति, घरेलू हिंसा, दूसरों की देखभाल की जिम्मेदारी, चिंता और अवसाद जैसी स्थितियां आती हैं, जिनमें उनकी नींद लंबे समय तक प्रभावित हो सकती है।

अनिद्रा पर किए जा रहे अनुसंधानों में वर्तमान में जो प्रमुख मुद्दे शामिल किए गए हैं, उनमें इसके अलग-अलग लक्षणों की गहरी समझ हासिल करना और यह जानना शामिल है कि उनका सेहत और काम करने की क्षमता पर क्या असर पड़ता है।

उदाहरण के लिए, इस बात के प्रमाण मिले हैं कि रात में नींद आने में परेशानी, देर रात सोने और सुबह जल्दी उठने में कठिनाई अवसाद के जोखिम को अधिक बढ़ाती है।

इसी तरह, वैज्ञानिक यह भी समझने की कोशिश कर रहे हैं कि अनिद्रा की समस्या के साथ मस्तिष्कीय गतिविधियों, हृदयगति और स्ट्रेस हार्मोन के स्तर में क्या बदलाव आते हैं। अन्य सभी मानसिक स्वास्थ्य विकारों की तरह ही वैज्ञानिक फिलहाल अनिद्रा के लिए भी जिम्मेदार किसी स्पष्ट ‘बायोमार्कर’ (जैविक संकेत) की पहचान नहीं कर पाए हैं।

इलाज के उपाय

-हालांकि, शोध से हमें कुछ ऐसे उपायों के बारे में जानकारी मिली है, जिन्हें अपनाकर लोग शुरुआती अनिद्रा को लंबे समय तक बरकरार रहने वाली अनिद्रा (क्रॉनिक इंसोमनिया) में तब्दील होने से रोक सकते हैं। यह खोज इसलिए अहम है, क्योंकि ‘क्रॉनिक इंसोमेनिया’ का इलाज बहुत मुश्किल है।

अगर अनिद्रा के लक्षण लगभग हर रात को सताएं और तीन महीने से ज्यादा समय तक बने रहें, तो इसे ‘क्रॉनिक इंसोमेनिया’ माना जा सकता है।

अनिद्रा के दौरान विकसित होने वाली सबसे आम और हानिकारक आदतों में से एक है-सोने की कोशिश में बिस्तर पर लेटे रहना। वैज्ञानिकों ने पाया कि नींद के इंतजार में लंबे समय तक बिस्तर पर लेटे रहने से दिमाग लगातार सक्रिय बना रहता है और वह धीरे-धीरे यह सीख लेता है कि बिस्तर पर लेटने का संबंध सोने से नहीं है, जिससे नींद आना और मुश्किल हो जाता है।

इसलिए, अगर आपको रात में सोने में परेशानी हो रही है, तो नींद के इंतजार में बिस्तर पर न पड़े रहें, बल्कि उठें और खुद को किसी ऐसे काम में मशगूल करें, जिससे आपके दिमाग को सुकून मिले। इसमें किताबें पढ़ना, अगले दिन की कार्य सूची बनाना, संगीत सुनना या श्वास संबंधी व्यायाम करना शामिल है।

जब आपको नींद महसूस होने लगे, तो बिस्तर पर लौट जाएं।

दिन में थकान महसूस होने पर अधिकतम 20 मिनट की नींद लें और शाम के समय में सोने से बचें। ध्यान रखें कि दिन या शाम के समय में लंबे समय तक सोने से रात में नींद के आगोश में जाने में कठिनाइयों का सामना करना पड़ सकता है।

अनिद्रा की समस्या लंबे समय तक बने रहने पर चिकित्सकीय परामर्श लेने में देरी न करें। नींद की गोलियों को दीर्घकालिक उपाय के तौर पर न इस्तेमाल करें, क्योंकि इनके सेवन से शारीरिक सक्रियता, संज्ञानात्मक क्षमता और तर्क शक्ति में कमी, गिरने के जोखिम में वृद्धि, नींद के लिए दवाओं पर निर्भरता, दिन में सुस्ती, सिरदर्द, चक्कर और आंखों के सामने धुंधलापन छाने की समस्या सता सकती है।

(द कन्वरसेशन)

Tags: अनिद्रा अपने आप में एक बीमारी
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