लखनऊ, इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने नाबालिग लड़की के अपहरण के मामले में सात साल के कठोर कारावास की सजा पाए एक व्यक्ति को बरी कर दिया है। अदालत ने कहा कि निचली अदालत ने पीड़िता की उम्र तय करने में लगभग विशेषज्ञ की भूमिका निभाई, जबकि चिकित्सकीय जांच में उसकी उम्र करीब 18 वर्ष बताई गई थी।
उच्च न्यायालय की लखनऊ पीठ के न्यायमूर्ति सुभाष विद्यार्थी ने भैया लाल रैदास की ओर से दाखिल अपील को स्वीकार करते हुए उन्नाव की अतिरिक्त सत्र अदालत के आठ फरवरी, 2013 के फैसले को रद्द कर दिया।
अतिरिक्त सत्र अदालत ने भारतीय दंड संहिता (आईपीसी) की धारा 366 (महिला को शादी के लिए मजबूर करने आदि के उद्देश्य से अपहरण या बहला-फुसलाकर ले जाना) के तहत उसे दोषी ठहराते हुए सात साल के कठोर कारावास की सजा सुनाई थी।
शुक्रवार को उपलब्ध कराए गए आदेश में उच्च न्यायालय ने कहा कि निचली अदालत को पीड़िता के दांतों और शारीरिक बनावट के आधार पर उसकी उम्र का अपना आकलन नहीं करना चाहिए था और चिकित्सक तथा रेडियोलॉजिस्ट की राय को दरकिनार नहीं करना चाहिए था। चिकित्सकीय जांच में पीड़िता की उम्र करीब 18 वर्ष बताई गई थी।
पीठ ने कहा कि निचली अदालत ने प्रभावी रूप से चिकित्सकीय विशेषज्ञों की राय के बजाय अपनी राय को प्राथमिकता दी।
अदालत ने कहा कि चिकित्सकीय उम्र निर्धारण में दो साल तक की त्रुटि की संभावना रहती है। ऐसे में अपहरण के समय पीड़िता की उम्र 20 वर्ष तक हो सकती थी। अदालत ने कहा कि अभियोजन पक्ष यह साबित करने में विफल रहा कि घटना के समय पीड़िता नाबालिग थी।
पीठ ने पीड़िता की जन्मतिथि से जुड़े अभियोजन पक्ष के साक्ष्यों में भी कमियां पाईं।
अदालत ने कहा कि पीड़िता के पिता ने प्राथमिकी में उसकी उम्र का उल्लेख नहीं किया था और गवाही के दौरान भी कहा था कि उन्हें उसकी उम्र या जन्मतिथि की निश्चित जानकारी नहीं है। बाद में पीड़िता ने आठवीं कक्षा की अंकतालिका का हवाला दिया, जिसमें कथित तौर पर उसकी जन्मतिथि 25 सितंबर, 1993 दर्ज थी।
हालांकि, न तो मूल अंकतालिका और न ही उसकी प्रति निचली अदालत के रिकॉर्ड में मौजूद थी और न ही उस दस्तावेज को प्रदर्श के रूप में दर्ज किया गया था। उच्च न्यायालय ने कहा कि निचली अदालत अंकतालिका में दर्ज जन्मतिथि पर भरोसा नहीं कर सकती थी।
पीठ ने कहा कि इस मामले में अंकतालिका को साबित करने के लिए न तो प्रधानाचार्य, न ही प्रधानाध्यापक और न ही स्कूल का कोई अन्य सक्षम अधिकारी पेश हुआ। उच्च न्यायालय ने सुनवाई के विभिन्न चरणों में पीड़िता के बयानों की भी जांच की।
अदालत ने कहा कि मजिस्ट्रेट के सामने दिए बयान में पीड़िता ने कहा था कि वह अपनी इच्छा से आरोपी के साथ गई थी। उसने बताया था कि दोनों एक-दूसरे से शादी करना चाहते थे और वह उसके साथ रहना चाहती थी। उसने अपने माता-पिता के पास लौटने से भी इनकार किया था।
हालांकि, निचली अदालत में बयान देते समय उसने आरोप लगाया कि आरोपी ने उसे कोई पदार्थ सुंघाकर बेहोश कर दिया और पंजाब के लुधियाना ले गया।
अदालत ने कहा कि किसी मामले में केवल पीड़िता की गवाही के आधार पर दोषसिद्धि की जा सकती है, लेकिन ऐसी गवाही अत्यधिक विश्वसनीय और पूरी तरह भरोसेमंद होनी चाहिए।
पीठ ने कहा कि पीड़िता ने जांच अधिकारी और मजिस्ट्रेट के सामने दिए अपने पहले के बयानों से इनकार नहीं किया था।
उच्च न्यायालय ने यह भी कहा कि पीड़िता करीब सात महीने तक लुधियाना में आरोपी के साथ किराये के मकान में रही और इस दौरान उसने आरोपी द्वारा बल प्रयोग किए जाने की कोई शिकायत नहीं की थी।