राफा, (एपी) दक्षिणी गाजा में रविवार को इजराइली हमले में दो फिलिस्तीनी पत्रकारों की मौत हो गई, जिनमें अल जज़ीरा के जाने-माने अरबी संवाददाता वाएल दहदौह का बेटा भी शामिल है।
दहदौह इस जंग में अपनी पत्नी, दो अन्य बच्चों और एक पोते को पहले ही खो चुके हैं और युद्ध के शुरुआती चरण में वह भी मौत के मुंह में जाने से बाल बाल बचे थे।
हालांकि, दहदौह ने इजराइल और हमास के बीच लड़ाई की रिपोर्टिंग जारी रखी है, जबकि इस युद्ध ने उनके परिवार को तबाह कर दिया है। उनके परिवार की तबाही फलस्तीनी पत्रकारों के सामने जारी खतरों का प्रतीक बन गयी है। काफी संख्या में फलस्तीनी पत्रकार इस युद्ध को कवर करते वक्त मारे गए हैं।
हमास के मीडिया कार्यालय के अनुसार, अल जजीरा के लिए काम कर रहे हमजा दहदौह और स्वतंत्र पत्रकार मुस्तफा थराया की उस वक्त मौत हो गई, जब वे खान यूनिस से राफा की ओर जा रहे थे। मीडिया कार्यालय ने बताया कि उनकी कार गोलाबारी की चपेट में आ गयी।
फोटो पत्रकार आमेर अबू अम्र ने एक फेसबुक पोस्ट में कहा कि वह और एक अन्य पत्रकार अहमद अल-बुर्श हमले में बाल-बाल बच गए।
इजराइली सेना की ओर से तत्काल कोई टिप्पणी नहीं आई है। दहदौह ने अपने बेटे को दफ़नाने के बाद अल जज़ीरा से बात करते हुए युद्ध की कवरेज जारी रखने का संकल्प लिया। उन्होंने कहा, ‘‘पूरी दुनिया को यह देखना चाहिए कि यहां गाजा पट्टी में क्या हो रहा है।’’
उन्होंने कहा, ‘‘जो हो रहा है, वह असहाय लोगों, नागरिक लोगों के साथ बहुत बड़ा अन्याय है। पत्रकारों के रूप में यह हमारे लिए भी अनुचित है।’’
दहदौह अक्टूबर के अंत में आक्रामक हमले की रिपोर्टिंग कर रहे थे, जब उन्हें खबर मिली कि उनकी पत्नी, बेटी और एक अन्य बेटा इजराइली हवाई हमले में मारे गए हैं। उसी हमले में घायल उनके पोते की कुछ घंटों बाद मृत्यु हो गई।
दिसंबर में, खान यूनिस के एक स्कूल पर इजराइली हमले में दहदौह और अल जजीरा के कैमरामैन समीर अबू दक्का घायल हो गए थे। अल जज़ीरा के अनुसार, दहदौह मदद हासिल करने में सफल रहे थे, लेकिन अबू दक्का घंटों तक खून से लथपथ रहे थे, क्योंकि अवरुद्ध सड़कों के कारण एम्बुलेंस उन तक पहुंच सकने में असमर्थ थी।
इससे पहले दिसंबर में, एक हमले में अल जज़ीरा के एक अन्य संवाददाता मोमेन अल शराफी के पिता, माता और परिवार के 20 अन्य सदस्यों की मौत हो गई थी।
स्वास्थ्य मंत्रालय के अनुसार, हमास-शासित गाजा में जारी युद्ध में 22,800 से अधिक फलस्तीनी मारे गए हैं, जिनमें ज्यादातर महिलाएं और नाबालिग हैं।


