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अत्यधिक प्रसंस्कृत खाद्य पदार्थों; जबकि इनके अस्वास्थ्यकर होने के पर्याप्त प्रमाण, बेचा जाता है कि उनकी लत लगे? जाने!!

ब्यूरो पब्लिकन्यूज़360 by ब्यूरो पब्लिकन्यूज़360
May 1, 2026
in Featured, अंतराष्ट्रीय, देश
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अत्यधिक प्रसंस्कृत खाद्य पदार्थों—जैसे सॉफ्ट ड्रिंक, स्नैक्स और रेडी-टू-ईट भोजन—का वैश्विक स्तर पर उपभोग बढ़ रहा है, जबकि इनके अस्वास्थ्यकर होने के पर्याप्त प्रमाण मौजूद हैं।

अत्यधिक प्रसंस्कृत खाद्य पदार्थ (यूपीएफ) सुपरमार्केट की पैकेज्ड खाद्य वस्तुओं का करीब 70 प्रतिशत हिस्सा हैं तथा सुविधा स्टोरों में यह अनुपात और अधिक है।

नए शोध में बताया गया है कि इन उत्पादों को बनाने वाली कंपनियां मानव व्यवहार और मनोविज्ञान का उपयोग कर इन्हें सबसे आसान, आकर्षक और संतोषजनक विकल्प के रूप में पेश करती हैं।

अध्ययन के अनुसार, यूपीएफ इस तरह डिजाइन किए जाते हैं कि लोग उन्हें खाने की इच्छा करें और अधिक मात्रा में उनका सेवन करें। इनका विपणन सभी वर्गों, विशेषकर बच्चों को ध्यान में रखकर किया जाता है, जिससे ये स्वादिष्ट, सुविधाजनक और किफायती विकल्प प्रतीत होते हैं, भले ही इनके स्वास्थ्य पर कई दुष्प्रभाव हों।

शोध में कहा गया है कि लोगों का यूपीएफ की ओर आकर्षण संयोग नहीं है, बल्कि कंपनियां खपत बढ़ाने के लिए कई रणनीतियों का इस्तेमाल करती हैं, जो मानव सोच, भावनाओं और व्यवहार का फायदा उठाती हैं।

चिकित्सा पत्रिका ‘द लैंसेट’ के अनुसार, यूपीएफ अत्यधिक प्रसंस्कृत खाद्य पदार्थ होते हैं, जो सस्ते अवयवों से तैयार किए जाते हैं और इनमें कई प्रकार के एडिटिव्स मिलाए जाते हैं, जबकि अंतिम उत्पाद में वास्तविक खाद्य सामग्री बहुत कम या न के बराबर होती है।

इन खाद्य पदार्थों की व्यापक ब्रांडिंग और विपणन किया जाता है तथा अधिकतर उत्पाद बड़ी अंतरराष्ट्रीय कंपनियों द्वारा बनाए जाते हैं।

यूपीएफ से भरपूर आहार मोटापा, टाइप-2 मधुमेह, उच्च रक्तचाप, हृदय रोग, कैंसर, क्रोनिक किडनी रोग और अवसाद जैसी गंभीर बीमारियों के जोखिम के साथ ही समय से पहले मृत्यु का खतरा भी बढ़ाता है।

शोध में यह समझने की कोशिश की गई कि लोग इन खतरों को जानते हुए भी यूपीएफ का अधिक सेवन क्यों करते हैं। इसके लिए शोधकर्ताओं ने पिछले एक दशक के अध्ययनों की समीक्षा की और ‘कैजुअल लूप डायग्राम’ के माध्यम से इस प्रणाली को समझाया, जो यह दर्शाते हैं कि कैसे विभिन्न कारक मिलकर यूपीएफ की खपत बढ़ाते हैं।

अध्ययन में पाया गया कि इन उत्पादों में परिष्कृत कार्बोहाइड्रेट और वसा का ऐसा संयोजन किया जाता है, जो शरीर और मस्तिष्क के ‘रिवॉर्ड सिस्टम’ को सक्रिय कर लत जैसा प्रभाव पैदा करता है।

इसके अलावा, प्रसंस्करण के ऐसे तरीके अपनाए जाते हैं जो पेट भरने के प्राकृतिक संकेत को दबाते हैं या पाचन को तेज करते हैं, जिससे तुरंत संतुष्टि मिलती है लेकिन वह जल्दी खत्म हो जाती है और व्यक्ति फिर से खाने की इच्छा करता है।

विपणन के स्तर पर इन उत्पादों को आसानी से संग्रहित और उपयोग योग्य बनाया जाता है तथा इन्हें ‘पैसे की पूरी कीमत’ देने वाला विकल्प बताया जाता है। बच्चों को आकर्षित करने के लिए लोकप्रिय संस्कृति, मनोरंजन और ‘मज़ेदार’ छवि का उपयोग किया जाता है।

शोध में यह भी बताया गया है कि कंपनियां उपभोक्ताओं की खरीदारी और ऑनलाइन व्यवहार से जुड़े डेटा का व्यापक विश्लेषण कर लक्षित डिजिटल विज्ञापन तैयार करती हैं, जिससे बिक्री और बढ़ती है।

कुल मिलाकर, शोध में 11 ऐसे तंत्रों (फीडबैक लूप्स) की पहचान की गई है, जो लोगों को अधिक यूपीएफ खरीदने और खाने के लिए प्रेरित करते हैं तथा स्वस्थ विकल्पों को पीछे धकेलते हैं।

शोधकर्ताओं के अनुसार, अस्वास्थ्यकर आहार और अधिक वजन न्यूजीलैंड में रोकी जा सकने वाली समयपूर्व मृत्यु और विकलांगता के लगभग 18 प्रतिशत मामलों के लिए जिम्मेदार हैं, और ये दोनों जोखिम कारक यूपीएफ के अधिक सेवन से जुड़े हैं।

अध्ययन में कहा गया है कि यूपीएफ से भरपूर आहार केवल व्यक्तिगत पसंद या इच्छाशक्ति की कमी का परिणाम नहीं, बल्कि एक सुनियोजित प्रणाली का नतीजा है।

विशेषज्ञों ने सरकारों से आग्रह किया है कि वे इन उत्पादों पर नियंत्रण के लिए सख्त नीतियां अपनाएं, जैसे कर लगाना, बच्चों को लक्षित विज्ञापनों पर रोक, स्पष्ट लेबलिंग और नीति निर्माण में पारदर्शिता।

शोध के अनुसार, खाद्य प्रणाली में संतुलन लाना जरूरी है, ताकि वह वर्तमान और भविष्य में लोगों के स्वास्थ्य के अनुकूल हो सके।

(द कन्वरसेशन)

Tags: क्या अत्यधिक प्रसंस्कृत खाद्य पदार्थों
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