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सरोगेसी आयु सीमा पर इलाहाबाद उच्च न्यायालय का बड़ा फैसला, प्रजनन की स्वतंत्रता के मौलिक अधिकार का उल्लंघन

ब्यूरो पब्लिकन्यूज़360 by ब्यूरो पब्लिकन्यूज़360
July 15, 2026
in उत्तर प्रदेश, देश
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इलाहाबाद उच्च न्यायालय की लखनऊ पीठ ने माता-पिता बनने के इच्छुक लोगों के प्रजनन अधिकारों की रक्षा करते हुए मंगलवार को व्यवस्था दी कि सरोगेसी (विनियमन) अधिनियम, 2021 के तहत निर्धारित अधिकतम आयु सीमा उन दंपतियों पर सख्ती से लागू नहीं की जा सकती, जिन्होंने कानून लागू होने से पहले ही कृत्रिम गर्भाधान (आईवीएफ) प्रक्रिया शुरू कर दी थी और जिनके भ्रूण पहले से ही सुरक्षित कर लिए गए थे।

न्यायमूर्ति शेखर बी. सराफ और न्यायमूर्ति ए.के. चौधरी की खंडपीठ ने कहा कि ऐसे दंपतियों को केवल इस आधार पर सरोगेसी की अनुमति से वंचित करना कि वे कानूनी आयु सीमा पार कर चुके हैं, संविधान के अनुच्छेद-21 के तहत प्रदत्त प्रजनन की स्वतंत्रता और व्यक्तिगत स्वतंत्रता के अधिकार का उल्लंघन होगा।

पीठ ने कहा, ‘‘हमारा मानना है कि सरोगेसी (विनियमन) अधिनियम, 2021 के तहत आयु सीमा को सख्ती से लागू करना, संविधान के अनुच्छेद-21 के तहत व्यक्तिगत स्वतंत्रता का हिस्सा माने जाने वाले प्रजनन की स्वतंत्रता के मौलिक अधिकार का उल्लंघन है।

खंडपीठ ने यह आदेश उस दंपति की रिट याचिका का निस्तारण करते हुए दिया, जिसने 25 जनवरी 2022 को सरोगेसी (विनियमन) अधिनियम लागू होने से पहले ही आईवीएफ का उपचार शुरू कर दिया था।

अदालत के समक्ष बताया गया कि कई बार उपचार कराने के बावजूद दंपति को संतान प्राप्ति नहीं हो सकी, हालांकि व्यवहार्य भ्रूणों को शीत-संरक्षण (क्रायोप्रिजर्वेशन) के माध्यम से सुरक्षित कर लिया गया था। बाद में चिकित्सकों ने चिकित्सीय कारणों से उन्हें सरोगेसी अपनाने की सलाह दी।

हालांकि, जब उन्होंने सरोगेसी की अनुमति के लिए आवेदन किया, तब तक नया कानून लागू हो चुका था। अधिनियम के अनुसार इच्छुक महिला की आयु 23 से 50 वर्ष तथा इच्छुक पुरुष की आयु 26 से 55 वर्ष के बीच होनी चाहिए। आयु सीमा पार हो जाने के कारण उन्हें अयोग्य घोषित कर दिया गया।

अदालत ने कहा कि याचिकाकर्ताओं ने कानून लागू होने से पहले ही आईवीएफ प्रक्रिया वैध रूप से शुरू कर दी थी। ऐसे में आयु संबंधी प्रावधानों को पूर्व प्रभाव से लागू करना न केवल अन्यायपूर्ण होगा, बल्कि संवैधानिक सिद्धांतों के भी प्रतिकूल होगा।

पीठ ने कहा कि प्रजनन का अधिकार संविधान के अनुच्छेद-21 के तहत व्यक्ति की गरिमा, निजता और निर्णय लेने की स्वतंत्रता का अभिन्न हिस्सा है, इसलिए अधिकारियों को कानून की कठोर और यांत्रिक व्याख्या करने के बजाय प्रत्येक मामले के विशेष तथ्यों और परिस्थितियों के आधार पर निर्णय लेना चाहिए।

उच्च न्यायालय ने अधिकारियों के रवैये पर असहमति जताते हुए लखनऊ के मुख्य चिकित्सा अधिकारी (सीएमओ) को निर्देश दिया कि वे दंपति के आवेदन पर पुनर्विचार करें और केवल आयु सीमा के आधार पर उसे खारिज न करें।

अदालत ने यह भी निर्देश दिया कि सभी आवश्यक तथ्यों और परिस्थितियों पर विचार करने तथा निर्धारित प्रक्रिया का पालन करने के बाद कानून के अनुरूप नया निर्णय लिया जाए।

Tags: सरोगेसी आयु सीमा
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