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सुप्रीमकोर्ट: आधार नागरिकता का प्रमाण नहीं, एसआईआर के लिए दस्तावेजीकरण व्यवस्था कायम

ब्यूरो पब्लिकन्यूज़360 by ब्यूरो पब्लिकन्यूज़360
May 28, 2026
in उत्तर प्रदेश, देश
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उच्चतम न्यायालय ने मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण (एसआईआर) के लिए निर्वाचन आयोग द्वारा अपनाई गई दस्तावेजीकरण की व्यवस्था को बरकरार रखते हुए बुधवार को कहा कि यह न तो मनमाना था और न ही वैधानिक योजना से बाहर था।

निर्वाचन आयोग की स्वायत्तता को सुदृढ़ करते हुए एक ऐतिहासिक फैसले में, प्रधान न्यायाधीश सूर्यकांत और न्यायमूर्ति जॉयमाल्या बागची की पीठ ने एसआईआर की कवायद संबंधी आयोग के अधिकार को बरकरार रखा और कहा कि ‘‘आधार नागरिकता का प्रमाण नहीं है।

प्रधान न्यायाधीश ने 124 पृष्ठ के फैसले में, जनगणना प्रक्रिया के हिस्से के रूप में आयोग द्वारा निर्धारित दस्तावेजीकरण प्रक्रिया की वैधता पर अलग से विचार किया।

फैसले में कहा गया कि निर्वाचन आयोग को निवास और पात्रता जैसी वैधानिक शर्तों को स्थापित करने में दस्तावेजों के महत्व के आधार पर उन्हें वर्गीकृत करने का अधिकार है।

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फैसले का एक मुख्य बिंदु जनगणना प्रक्रिया में आधार कार्ड की वैधता है।

शीर्ष अदालत ने आधार पर स्पष्टीकरण देते हुए कहा कि 12 अंकों के इस विशिष्ट पहचान से संबंधित कानून इसे नागरिकता या निवास प्रमाण के रूप में मान्यता नहीं देता है। इसलिए, निर्वाचन आयोग द्वारा इसे मतदान के लिए वैधानिक पात्रता स्थापित करने वाले प्राथमिक दस्तावेज के रूप में न मानना ​​उचित है।

न्यायालय ने कहा, ‘‘आधार को बाहर रखने के संबंध में, आयोग द्वारा बताये गए औचित्य की जांच आधार अधिनियम के आलोक में की जानी चाहिए। आधार को नियंत्रित करने वाला वैधानिक ढांचा इसे नागरिकता या निवास प्रमाण के रूप में नहीं मानता है।

फैसले में जन प्रतिनिधित्व अधिनियम की धारा 23(4) का उल्लेख किया गया है, जो किसी व्यक्ति की पहचान स्थापित करने के सीमित उद्देश्य के लिए आधार कार्ड के उपयोग की अनुमति देता है।

इस फैसले ने न्यायालय के पूर्व के आदेश की पुष्टि की और आयोग को बिहार की संशोधित मतदाता सूची में पहचान सत्यापन के लिए आधार को ‘‘अतिरिक्त 12वें दस्तावेज’’ के रूप में मानने का निर्देश दिया।

निर्वाचन आयोग के दस्तावेजीकरण मानकों को चुनौती देने वाली याचिकाओं को खारिज करते हुए, फैसले में इस बात पर जोर दिया गया कि मतदाता सूची तैयार करना कोई ‘‘मशीनी प्रक्रिया’’ नहीं बल्कि एक मूलभूत संवैधानिक कर्तव्य है।

न्यायालय ने कहा, ‘‘प्रारंभ में ही, यह स्वीकार करना आवश्यक है कि मतदाता सूची तैयार करना और उसका रखरखाव करना कोई मशीनी कार्य नहीं है, बल्कि यह आयोग को सौंपा गया एक संवैधानिक कार्य है। मतदाता सूची की शुद्धता, सटीकता और अखंडता सुनिश्चित करने का दायित्व निरंतर बना रहता है और यह लोकतांत्रिक प्रक्रिया का मूलभूत आधार है।

न्यायालय ने कहा, ‘‘इस दायित्व के साथ पात्रता स्थापित करने के लिए आवश्यक दस्तावेजों की प्रकृति और सीमा सहित सत्यापन के लिए उपयुक्त प्रक्रियाएं तैयार करने का अधिकार भी निहित है’’

पीठ ने कहा कि आधार ‘‘निर्णायक प्रमाण’’ नहीं है, और अधिकारियों को मतदाता की प्रामाणिकता को सत्यापित करने के लिए अतिरिक्त सामग्री मंगाने का अधिकार है।

पीठ ने एसआईआर के लिए निर्धारित दस्तावेजों की सूची से राशन कार्ड को बाहर रखने के आयोग के निर्णय का भी समर्थन किया।

न्यायालय ने कहा, ‘‘इसी प्रकार, राशन कार्ड को सूची से बाहर रखने का निर्णय आयोग द्वारा उसकी साक्ष्य विश्वसनीयता के आकलन पर आधारित है। जन प्रतिनिधित्व अधिनियम की धारा 21(3) के अंतर्गत विशेष गहन सर्वेक्षण की रूपरेखा तैयार करते समय, आयोग का विवेकाधिकार 1960 के नियमों के नियम 4 से 23 तक ही सीमित नहीं है।

पीठ ने कहा, ‘‘आयोग के पास यह अधिकार है कि वह किसी विशेष गहन सर्वेक्षण के उद्देश्य और इरादे के अनुरूप फॉर्म 6 में राशन कार्ड जैसे दस्तावेज को अन्य प्रकार के दस्तावेजों से प्रतिस्थापित कर सकता है। यह उल्लेख करना उचित होगा कि पासपोर्ट या जन्म प्रमाण पत्र के विपरीत, राशन कार्ड नागरिकता का निर्णायक प्रमाण नहीं है।

पीठ ने कहा कि निर्वाचन आयोग के पास गहन सत्यापन प्रक्रिया की कठोरता को ध्यान में रखते हुए, राशन कार्ड को अधिक विश्वसनीय साक्ष्यों से प्रतिस्थापित करने जैसे ‘‘विवेकाधिकार’’ है।

न्यायालय ने कहा कि निर्वाचन आयोग का दस्तावेजीकरण ढांचा न तो मनमाना है और न ही कानून का उल्लंघन करता है। पीठ ने कहा कि दस्तावेजों का वर्गीकरण ‘‘स्पष्ट मानदंडों’’ पर आधारित है, जिसका सीधा संबंध मतदाता सूची को ‘‘पुख्ता’’ बनाने से है।

Tags: सुप्रीमकोर्ट: आधार नागरिकता का प्रमाण नहीं
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