महामारी की शुरुआत में मधुमेह (डायबिटीज) से पीड़ित कई लोग सोच रहे थे कि कोविड-19 का उनके लिए क्या मायने है। यह पहले से ही ज्ञात था कि मधुमेह से लोगों को फ्लू सहित अन्य संक्रामक बीमारियों का अधिक जोखिम होता है। क्या कोविड-19 के साथ भी ऐसा ही होगा? उस समय, सभी वैज्ञानिक केवल अकादमिक ज्ञान और सिद्धांतों के आधार पर अनुमान लगा सकते थे।
साल 2024 में, चीजें बहुत अलग दिख रही हैं। बहुत अधिक अनुसंधान उपलब्ध हैं, साथ ही प्रभावी टीके भी हैं, और कई मायनों में जीवन सामान्य हो चुका है।
हालांकि, कोविड-19 खत्म नहीं हुआ है और दुनिया भर में मधुमेह से पीड़ित 40 करोड़ से अधिक लोगों पर इस महामारी के वास्तविक जोखिम और प्रभाव अब भी बने हुए हैं।
मुझे कई क्षेत्रों में स्वास्थ्य नीति को सूचित करने के लिए मौजूदा साक्ष्यों का इस्तेमाल करने और उन्हें संयोजित करने में विशेषज्ञता हासिल है। मैं महामारी की शुरुआत से ही कोविड-19 और मधुमेह का अध्ययन कर रही हूं और मैंने कई तरीकों से मधुमेह से पीड़ित लोगों से उनपर महामारी के प्रभाव की जानकारी प्राप्त की है। मैं पिछले 30 सालों से टाइप-1 डायबिटीज से पीड़ित हूं और महामारी की शुरुआत में, मेरे मन में बहुत सारे सवाल थे कि कोविड-19 मेरे लिए क्या मायने रखता है।
मधुमेह की परिभाषा
मधुमेह की पहचान सामान्य से अधिक रक्त शर्करा के स्तर से होती है। विभिन्न प्रकार के मधुमेह अलग-अलग तरीकों से इस स्थिति को पैदा करते हैं।
टाइप-1 मधुमेह तब होती है जब आपका शरीर इंसुलिन बनाने वाली कोशिकाओं पर हमला करता है। इंसुलिन वह हार्मोन है जो शर्करा को ऊर्जा में बदलता है- इसके बिना, शर्करा खून में बनी रहती है और शरीर को ज़रूरी ऊर्जा नहीं मिल पाती। टाइप-1 मधुमेह का इलाज केवल इंसुलिन के इंजेक्शन से किया जा सकता है और यह अपरिवर्तनीय है। अगर इसका इलाज न किया जाए, तो टाइप-1 मधुमेह जानलेवा हो सकती है। इसका कोई इलाज नहीं है। कोई भी निश्चित रूप से नहीं जानता कि कुछ लोगों को टाइप-1 मधुमेह की बीमारी क्यों होती है और दूसरों को क्यों नहीं।
इसके विपरीत, टाइप-2 मधुमेह का अब तक का सबसे आम प्रकार है। इसमें आपका शरीर इंसुलिन का उत्पादन तो करता है लेकिन इसका उपयोग करने में पूरी तरह से सक्षम नहीं होता। मोटापे से पीड़ित लोगों को टाइप-2 मधुमेह होने की आशंका अधिक होती है। लेकिन जो लोग मोटे नहीं हैं, उन्हें भी टाइप 2 मधुमेह हो सकता है, और मोटापे से पीड़ित कई लोगों को कभी मधुमेह नहीं होती।
टाइप-2 मधुमेह अक्सर परिवारों में एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी में आती है। इसका इलाज कई तरीकों से किया जा सकता है। इसमें मोटापे से पीड़ित लोगों के लिए वजन कम करना, आहार और व्यायाम में बदलाव और दवाएं शामिल हैं। कुछ मामलों में टाइप-2 मधुमेह पूरी तरह से ठीक हो सकता है।
टाइप-1 मधुमेह बचपन या किशोरावस्था में शुरू होने की सबसे ज्यादा आशंका होती है और टाइप-2 मधुमेह उम्र के एक पड़ाव पार करने के बाद शुरू होने की आशंका अधिक होती है। हालांकि, वृद्ध लोगों को टाइप-1 मधुमेह की बीमारी हो सकती है, और बच्चों को टाइप-2 मधुमेह होने की आशंका रहती है।
मधुमेह के अन्य प्रकार भी हैं। गर्भावस्था में मधुमेह हो सकता है और बच्चे के जन्म के बाद यह ठीक हो जाता है। इसमें भी टाइप-2 मधुमेह की तरह शरीर अभी भी इंसुलिन बना रहा होता है, लेकिन इसका इस्तेमाल करने में कम सक्षम होता है। अनुमान है कि 2050 तक दुनिया भर में 1.3 अरब लोग मधुमेह से पीड़ित होंगे।
मधुमेह आपके शरीर के कई अंगों को नुकसान पहुंचा सकता है, जिसमें आपकी आंखें, हृदय, रक्त वाहिकाएं, तंत्रिका तंत्र, पैर और गुर्दे शामिल हैं। रक्त शर्करा प्रबंधन और नियमित जांच इन जोखिमों को कम करने में मददगार साबित हो सकती है।
मधुमेह और कोविड
मेरे सहकर्मियों और मैंने 2023 के एक अध्ययन के दौरान व्यापक साहित्य की समीक्षा की, ताकि यह पता लगाया जा सके कि मधुमेह से पीड़ित लोगों को कोविड-19 से किस हद तक खतरा है, और क्या मधुमेह से पीड़ित कुछ लोग दूसरों की तुलना में अधिक जोखिम में हैं।
कुल मिलाकर, हमने पाया कि मधुमेह वाले लोगों में कोविड-19 से गंभीर रूप से बीमार होने की संभावना मधुमेह वाले लोगों की तुलना में लगभग दोगुनी थी। साक्ष्यों से यह भी पता चला कि मधुमेह वाले लोगों में कोविड-19 से मरने की संभावना मधुमेह वाले लोगों की तुलना में अधिक थी।
मधुमेह से पीड़ित कुछ लोगों को दूसरों की तुलना में ज्यादा जोखिम होता है। कोविड-19 संक्रमण से पहले या उसके दौरान लोगों का रक्त शर्करा स्तर जितना अधिक था, उनके परिणाम उतने ही खराब होने की आशंका थी। इसके अलावा टाइप-1 मधुमेह से पीड़ित लोगों और इंसुलिन का उपयोग करने वाले लोगों के लिए जोखिम आम तौर पर अधिक प्रतीत होता है।
इसके कई संभावित कारण हैं। हम जानते हैं कि उच्च रक्त शर्करा स्तर होने से लोगों के शरीर के लिए संक्रमणों से लड़ना कठिन हो जाता है। टाइप-1 मधुमेह से ग्रस्त मरीजों में रक्त शर्करा का स्तर टाइप-2 मधुमेह के मरीजों की तुलना में अधिक होता है। संक्रमण के कारण रक्त शर्करा के स्तर को नियंत्रित करना कठिन हो सकता है।
टाइप-1 मधुमेह के मरीज टाइप-2 मधुमेह से ग्रस्त लोगों की तुलना में लंबे समय तक मधुमेह के साथ रहते हैं, और इसका मतलब यह हो सकता है कि मधुमेह की जटिलताओं के कारण उनका शरीर कोविड-19 से लड़ने में कम सक्षम है। उदाहरण के लिए, उनके दिल और गुर्दे को नुकसान की अधिक आशंका होती है।
महामारी से उत्पन्न व्यवधान
महामारी ने मधुमेह से पीड़ित लोगों के लिए बड़े पैमाने पर व्यवधान पैदा किया। कई लोगों को अपने चिकित्सकों से परामर्श के लिए समय लेना मुश्किल हो गया। कुछ लोगों को अपनी दवाएं प्राप्त करना मुश्किल हो गया। कई लोगों के लिए, आहार और शारीरिक गतिविधि भी बाधित हुई।
हमने 10 लाख से ज्यादा लोगों पर किए गए 139 अध्ययनों की व्यापक, व्यवस्थित समीक्षा की, ताकि मधुमेह से पीड़ित लोगों पर महामारी के व्यवधानों के प्रभाव की जांच की जा सके। साक्ष्यों से पता चला कि महामारी के दौरान लोगों में मधुमेह से मरने की आशंका पहले की तुलना में अधिक थी और महामारी के दौरान मधुमेह के कारण दृष्टि खोने की अशंका भी पहले की तुलना में ज्यादा थी।
मधुमेह से पीड़ित लोगों को अपनी आंखों की रोशनी बनाए रखने के लिए नियमित रूप से आंखों की जांच करवानी होती है; महामारी के दौरान अक्सर ये जांच नहीं हो पाती थी, और परिणामस्वरूप लोगों की दृष्टि प्रभावित होती थी।
हमने यह भी पाया कि मधुमेह से पीड़ित युवा लोगों की स्थिति विशेष रूप से खराब थी। टाइप-1 मधुमेह से पीड़ित बच्चों और किशोरों को ‘डायबिटिक कीटोएसिडोसिस’ नामक जानलेवा स्थिति के साथ अस्पताल में भर्ती होने की अधिक आशंका थी, जिसमें आपका रक्त विषाक्त हो जाता है, क्योंकि शरीर में पर्याप्त इंसुलिन की मात्रा नहीं होती।
महामारी के दौरान मधुमेह के लिए बाल चिकित्सा गहन देखभाल इकाइयों में भर्ती होने वाले बच्चों की संख्या पहले की तुलना में अधिक थी। हो सकता है कि बच्चों के इलाज में देरी हुई हो, या महामारी के व्यवधानों के कारण वे अस्पतालों तक पहुंचने में असमर्थ रहे हों। इसका मतलब यह हो सकता है कि जब तक मधुमेह से पीड़ित कम उम्र के लोग अस्पताल पहुंचते थे, तब तक वे पहले से ही बहुत बीमार हो चुके होते थे।
भविष्य की राह
हालांकि, अब भी उम्मीद के बहुत सारे कारण हैं। कोविड-19 टीकों ने कोविड-19 से मरने या गंभीर रूप से बीमार होने के खतरे को काफी हद तक कम कर दिया है। कई देशों में, मधुमेह से पीड़ित लोगों को टीका लगाने में प्राथमिकता दी गई है।
मधुमेह इलाज भी बेहतर हुआ है। बेहतर मधुमेह प्रबंधन जिनमें इंसुलिन पंप या लगातार शर्करा के स्तर पर नजर रखने वाले ग्लूकोज मॉनिटर हो, व्यवहार परिवर्तन या दवाओं जैसी तकनीक की वजह से कोविड-19 और अन्य संक्रमणों के जोखिम को कम करने में मदद मिल सकती है।
वजन घटाने वाली दवाएं भी मधुमेह की रोकथाम में अहम भूमिका निभा सकती हैं, लेकिन अब भी निश्चित रूप से कुछ कहना जल्दबाजी होगी।
महामारी के दीर्घकालिक प्रभाव क्या होंगे, यह तो समय ही बताएगा। मधुमेह की जटिलताएं अक्सर कई वर्षों बाद विकसित हो सकती हैं। इसलिए मेरे जैसे अनुसंधानकर्ताओं को महामारी के दौरान मधुमेह प्रबंधन की चुनौतियों के परिणामस्वरूप अब से पांच से 10 वर्षों में मधुमेह की जटिलताओं से पीड़ित अधिक लोग दिखाई दे सकते हैं।
नियमित निगरानी मददगार साबित हो सकती है, खासतौर पर महामारी से सबसे ज्यादा प्रभावित समूहों की। समय रहते पता लगने पर मधुमेह की कई जटिलताओं का सफलतापूर्वक इलाज किया जा सकता है।


