राजनीतिक पर्यवेक्षकों द्वारा लगातार तीसरी बार सत्ता हासिल करने की प्रबल दावेदार मानी जा रही भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) ने आगामी लोकसभा चुनाव में 370 लोकसभा सीट जीतने का महत्वाकांक्षी लक्ष्य तय किया है। जनता के बीच एक विमर्श बनाने व मनोवैज्ञनिक बढ़त हासिल करने के लिए उसने यह लक्ष्य तय किया है और साथ ही इसके जरिए उसकी कोशिश जनमानस में विपक्ष को कमजोर दिखाना भी है।
पिछले पांच दशकों में केवल एक बार किसी पार्टी ने इतनी सीटें जीती हैं। इंदिरा गांधी की हत्या के बाद देश भर में सहानुभूति लहर के कारण 1984 में कांग्रेस ने 543 सदस्यीय सदन में 414 सीटों पर जीत दर्ज की थी।
निर्वाचन आयोग ने शनिवार को चुनाव कार्यक्रम की घोषणा के साथ 2024 के आम चुनाव का औपचारिक ऐलान किया। लोकसभा की 543 सीटों के लिए सात चरणों में मतदान होगा, जिसकी शुरुआत 19 अप्रैल को पहले चरण में 102 सीट के लिए मतदान के साथ होगी। इसके बाद 26 अप्रैल (89सीट), 7 मई (94सीट), 13 मई (96 सीट), 20 मई (49 सीट), 25 मई (57 सीट) और एक जून (57 सीट) को अन्य चरणों का मतदान संपन्न होगा। वोटों की गिनती चार जून को होगी।
संशयवादियों का मानना है कि भाजपा ने 2019 में अपना सर्वश्रेष्ठ प्रदर्शन किया था जब उसने पूर्व और मध्य भारत के हिंदी भाषी राज्यों में और पश्चिम में अपने गढ़ों में शानदार सफलता के साथ 303 सीटें जीतीं।
उनका तर्क है कि चूंकि भाजपा दक्षिण भारत और पश्चिम बंगाल जैसे राज्यों में हुए विधानसभा चुनावों में कोई सफलता अर्जित नहीं कर पाई, जहां उसने 2019 में खासी बढ़त हासिल की थी। इसलिए पार्टी के पास कोई बड़ी बढ़त की बहुत गुंजाइश नहीं है। उनके मुताबिक अगर विपक्ष एकजुट रहेगा तो भाजपा की सीट की संख्या कम हो सकती है।
हालांकि, भाजपा ने अपने शानदार प्रतिपुष्टि (फीडबैक) तंत्र, संगठनात्मक मजबूती और प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी जैसे करिश्माई नेता के दम पर अक्सर राजनीतिक पर्यवेक्षकों को अपने चुनावी प्रदर्शन से चौकाया है।
यहां सत्तारूढ़ पार्टी का एक स्वॉट यानि एसडब्ल्यूओटी (ताकत, कमजोरी, अवसर, खतरा) विश्लेषण है जो लगातार तीसरी बार सत्ता में आने को आतुर दिख रही है।
ताकत:
* भाजपा के पास प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के रूप में एक ऐसे नेता हैं जो विपक्षी नेताओं पर एक महानायक की तरह भारी पड़ते हैं। उनकी व्यापक अपील पार्टी के लिए लोकसभा चुनावों में उन राज्यों में भी प्रभावी रही, जहां उसके पास मजबूत संगठन की कमी थी। इनमें पश्चिम बंगाल, ओडिशा और तेलंगाना जैसे राज्य शामिल थे।
* 2014 के बाद से, भाजपा ने एक संगठनात्मक मशीनरी का निर्माण किया है जिसकी देखरेख क्षेत्रीय और राज्य स्तरों पर अनुभवी चुनाव प्रचारकों द्वारा की जाती है और इसकी निगरानी राष्ट्रीय नेतृत्व करता है।
* यह असामान्य नहीं है कि गैर-भाजपाई नेता भी इस संगठन की अत्यधिक श्रेष्ठता को स्वीकार करते हैं, यहां तक कि उन राज्यों में भी जहां यह सत्ता में नहीं है। हाल के विधानसभा चुनावों में राजस्थान और छत्तीसगढ़ में यह स्पष्ट हो गया था जब भाजपा सत्ता में लौटी थी।
* भाजपा की एक और ताकत चुनावी लड़ाई की ‘पिच’ तैयार करने में इसका निर्विरोध प्रभुत्व है, खासकर लोकसभा चुनाव में।
* जहां राष्ट्रीय और सांस्कृतिक गौरव पर बने इसके एजेंडे ने जनता के एक बड़े हिस्से के साथ गहरे स्तर पर तालमेल बिठाया है, वहीं कल्याणकारी योजनाओं के इर्द-गिर्द इसकी ‘लाभार्थी’ पहुंच ने गरीबों को प्रभावित किया है।
कमजोरियां:
* भाजपा ने अपने क्षेत्र में लोकप्रियता रखने वाले राज्यों के कई अनुभवी क्षत्रपों को किनारे कर युवा पीढ़ी के नेताओं को तैयार करने की कोशिश की है, जिनके पास अपने पूर्ववर्तियों की तरह कद नहीं है।
* राजस्थान के मुख्यमंत्री भजन लाल शर्मा, मध्य प्रदेश के मोहन यादव और हरियाणा के नायब सिंह सैनी जैसे नेताओं के राजनीतिक कौशल का परीक्षण होगा।
* देश के बड़े हिस्से में भाजपा का हिंदुत्व, राष्ट्रवाद और ‘लाभार्थी’ एजेंडा जितना गूंज रहा है उसका असर दक्षिण और पूर्वी भारत के कुछ हिस्सों में उतना नहीं दिखता जहां विपक्ष के भी मजबूत क्षत्रप हैं।
अवसर:
* भाजपा ने 2019 और 2014 की तुलना में इस बार अधिक मजबूती के साथ चुनावी लड़ाई शुरू की है।
* ‘इंडिया’ गठबंधन के तहत एकजुट होने की विपक्ष की कोशिश आधी अधूरी कवायद साबित होती दिख रही है। कांग्रेस के लगातार कमजोर होने के कारण उसकी स्थिति कमजोर ही हुई है। इससे यह धारणा बनती है कि भाजपा के सामने कोई गंभीर चुनौती नहीं है।
* आंध्र प्रदेश में एन चंद्रबाबू नायडू के साथ भाजपा के गठबंधन और तेलंगाना में बीआरएस और तमिलनाडु में एआईएडीएमके के कमजोर होने के अवसर को भुनाने के लिए प्रधानमंत्री लगातार दक्षिण के राज्यों में जोरशोर से अभियान चला रहे हैं।
खतरे:
* राजनीतिक दलों को फंडिंग के लिए इलेक्टोरल बॉण्ड योजना को रद्द करने के उच्चतम न्यायालय के फैसले और दानदाताओं के बारे में नवीनतम खुलासे ने विपक्ष को कथित भ्रष्टाचार और जांच एजेंसियों के दुरुपयोग पर सरकार को निशाना बनाने का मुद्दा दिया है।
* कुछ बड़े राज्य, जहां भाजपा ने 2019 में अच्छा प्रदर्शन किया था। ऐसे कर्नाटक और महाराष्ट्र में विपक्षी दलों की मजबूत उपस्थिति है, जबकि बिहार में राजद और उत्तर प्रदेश में समाजवादी पार्टी जैसे क्षेत्रीय दल अपने अन्य पिछड़ा वर्ग और दलित समर्थन आधार को छीनने की कोशिश कर रहे हैं।
* विपक्षी दल रोजगार और महंगाई जैसे रोजी-रोटी के मुद्दों के इर्द-गिर्द एक जवाबी विमर्श बनाने की कोशिश कर रहे हैं।


