अयोध्या, रामकथा के सातवें दिन कथावाचक उज्ज्वल शांडिल्य जी महाराज ने श्रीराम के रणलीला की कथा कही । महाराज जी ने कहा कि श्रीराम ही राष्ट्र के पर्याय हैं । जो राष्ट्र से प्रेम नहीं करता , वह राम से प्रेम नहीं कर सकता । राष्ट्र की सेवा रामसेवा मानकर करनी चाहिए ।
श्रीराम भारत को आतंकवाद से मुक्त करने के लिए वन गये । वन में शबरी और जटायु को अपनाकर उन्हें सद्गति प्रदान की । शबरी ने मतंग मुनि की निष्ठा से सेवा की थी। जो संत सद्गुरू में निष्ठा रखता है, उसी की प्रतिष्ठा समाज में होती है।
उन्होंने बताया आजकल लोग सेवा कम करते हैं और दिखावा अधिक करते हैं। माता शबरी सेवा करती थीं और छिपकर रहती थीं । परिणाम ये हुआ कि श्रीराम उनके द्वार पर आये।
भगवान का तीन बार ही पेट भरा – त्रेता में शबरी के बेरों से, द्वापर में विदुरानी काकी के केले के छिलकों से और कलियुग में कर्माबाई की खिचड़ी से। भगवान प्रेम के भूखे हैं ।
सुग्रीव और वाली का झगड़ा पुराना था, श्रीराम ने वाली का वध इसलिए किया क्योंकि उसने सुग्रीव की पत्नी का अपहरण करके रखा था। छोटे भाई की पत्नी, बहन, पुत्रवधू और कन्या ये चारों एकसमान होते हैं, इन्हें ग़लत दृष्टि से देखने वाला महापापी होता है ।
श्रीराम ने रावण का वध करके रामराज्य की स्थापना की। असामाजिक तत्वों का नाश किए बिना रामराज्य स्थापित नहीं हो सकता।
राज्य सरकार की प्रशंसा करते हुए कहा कि ऐसे सुंदर आयोजन के लिए सरकार धन्यवाद की पात्र है।
संस्कृति विभाग के कार्यक्रम अधिशासी श्री कमलेश कुमार पाठक के नेतृत्व में कथा व्यास जी का सम्मान संस्कृति विभाग की ओर से कथा व्यवस्था देख रहे वैभव मिश्रा जी ने किया।


