लखनऊ, राजनीति में एक ही घटनाक्रम को अलग-अलग नजरिए से देखने का चलन पुराना है। कहावत है— ‘सूप बोले तो बोले, चलनी भी बोले जिसमें बहत्तर छेद।’ सिक्किम के राज्यपाल पद पर भाजपा के अनुसूचित जाति मोर्चा के पूर्व अध्यक्ष दुष्यंत गौतम की नियुक्ति के बाद सियासी बहस तेज हो गई है। एक ओर भाजपा इसे संवैधानिक पद पर नियुक्ति के रूप में देख रही है, वहीं समाजवादी पार्टी और कांग्रेस अंकिता भंडारी हत्याकांड से जुड़े कथित ‘वीआईपी एंगल’ का हवाला देकर सवाल उठा रही हैं।
दुष्यंत गौतम को 12 अक्टूबर को सिक्किम का राज्यपाल नियुक्त किया गया था। वह भाजपा के राष्ट्रीय महासचिव भी रह चुके हैं और पार्टी के अनुसूचित जाति मोर्चा की जिम्मेदारी संभाल चुके हैं। उनकी नियुक्ति के बाद कांग्रेस ने विरोध प्रदर्शन किया, जबकि सपा सांसद डिंपल यादव ने भी सरकार पर सवाल उठाते हुए कहा कि अंकिता भंडारी को न्याय मिलने का इंतजार अब तक खत्म नहीं हुआ है।
डिंपल यादव ने सोशल मीडिया पर आरोप लगाया कि सरकार को दुष्यंत गौतम की कथित भूमिका से जुड़े पहलुओं की जांच करानी चाहिए थी, न कि उन्हें संवैधानिक पद पर नियुक्त करना चाहिए था।
वहीं, सपा अध्यक्ष अखिलेश यादव ने भी उत्तराखंड की बेटी अंकिता के लिए न्याय की मांग करते हुए मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ से इस नियुक्ति के मुद्दे पर आवाज उठाने की अपील की।
कांग्रेस ने भी नियुक्ति का विरोध करते हुए अंकिता के परिवार की मांगों का समर्थन किया है। 14 अक्टूबर को राहुल गांधी और प्रियंका गांधी वाड्रा ने दिल्ली में इंडिया गेट के पास प्रदर्शन कर रहे अंकिता के माता-पिता से मुलाकात की। परिवार की मांग है कि कथित ‘वीआईपी एंगल’ की जांच पूरी होने तक नियुक्ति पर पुनर्विचार किया जाए।
लेकिन इस पूरे घटनाक्रम में राजनीतिक सवाल यह भी है कि क्या किसी नेता की सामाजिक पृष्ठभूमि और उसे मिले संवैधानिक पद को लेकर बहस, उससे जुड़े दूसरे आरोपों की जांच की मांग से अलग रखकर नहीं देखी जानी चाहिए? अनुसूचित जाति समुदाय से आने वाले नेता को राज्यपाल नियुक्त किया जाना एक तथ्य है, जबकि अंकिता मामले में गौतम की कथित भूमिका को लेकर लगाए गए आरोप अलग विषय हैं।
इन आरोपों की न्यायिक पुष्टि नहीं हुई है और गौतम ने आरोपों को खारिज किया है। इसलिए नियुक्ति का विरोध करने वाले दलों के तर्क और आरोपों की सत्यता को अलग-अलग परखना जरूरी है।
अंकिता भंडारी ऋषिकेश के वनंत्रा रिजॉर्ट में रिसेप्शनिस्ट थीं। सितंबर 2022 में उनकी हत्या कर दी गई थी। इस मामले में रिजॉर्ट के मालिक पुलकित आर्य और उसके दो साथियों को दोषी ठहराकर आजीवन कारावास की सजा सुनाई गई थी। इसके बाद कथित ‘वीआईपी’ की भूमिका को लेकर विवाद जारी रहा। अंकिता के परिवार ने इस पहलू की जांच की मांग उठाई है।