सोशल मीडिया पर किसी महत्वपूर्ण और विश्वसनीय जानकारी को लोगों तक पहुंचाने में केवल तथ्य ही मायने नहीं रखते, बल्कि उसे किस भाषा और अंदाज में पेश किया जा रहा है, इसका भी बड़ा असर पड़ सकता है।
बच्चों के टीकाकरण से जुड़ी ऑनलाइन जानकारी पर किए गए एक हालिया शोध में सामने आया है कि यदि संदेश की भाषा लक्षित समुदाय की बातचीत और चिंताओं के अनुरूप हो, तो लोग उस पर अधिक ध्यान दे सकते हैं और उसके लिंक पर क्लिक करने की संभावना भी बढ़ सकती है।
शोध में फेसबुक पर बच्चों के टीकाकरण से संबंधित संदेशों का अध्ययन किया गया। उदाहरण के तौर पर एक संदेश में लोगों से कहा गया कि समुदाय और बच्चों की सुरक्षा के लिए टीकाकरण की बुकिंग करें, जबकि दूसरे संदेश में सवाल के अंदाज में पूछा गया कि बचपन में लगाए जाने वाले टीकों का बच्चों पर क्या असर होता है।
दोनों संदेश एक ही विश्वसनीय जानकारी तक पहुंचाते थे, लेकिन सवाल के रूप में तैयार किए गए संदेश पर क्लिक किए जाने की संभावना करीब 52 प्रतिशत अधिक पाई गई।
शोधकर्ताओं का उद्देश्य यह समझना था कि क्या तथ्यात्मक जानकारी को पेश करने का तरीका बदलकर उसे उन लोगों तक पहुंचाया जा सकता है, जो सामान्य परिस्थितियों में ऐसी जानकारी पर ध्यान नहीं देते। निष्कर्ष में संकेत मिला कि जानकारी समान रहने के बावजूद उसके शब्दों, भाषा और प्रस्तुति का तरीका लोगों की रुचि और जुड़ाव को प्रभावित कर सकता है।
शोध में गलत सूचना के संदर्भ में भी सोशल मीडिया की भूमिका पर चर्चा की गई। गलत सूचना ऐसी झूठी जानकारी है जिसे बिना नुकसान पहुंचाने के इरादे के साझा किया जाता है, जबकि दुष्प्रचार ऐसी झूठी जानकारी है जिसे तैयार करके जानबूझकर फैलाया जाता है। शोधकर्ताओं के अनुसार, समस्या केवल झूठे दावों तक सीमित नहीं है। अपेक्षाकृत सटीक जानकारी भी यदि किसी व्यक्ति की पहले से मौजूद सोच के अनुरूप लगातार साझा होती रहे, तो वह उसके मौजूदा विचारों को और मजबूत कर सकती है।
शोधकर्ताओं ने ऑस्ट्रेलिया की ऐसी फेसबुक कम्युनिटी का अध्ययन किया, जहां बच्चों के टीकाकरण को लेकर विरोधी विचार और दक्षिणपंथी विचारधारा से जुड़ी चर्चाएं होती थीं। इन समूहों में लोग केवल जानकारी साझा नहीं कर रहे थे, बल्कि व्यक्तिगत चिंताओं और अनुभवों को साझा करते हुए एक-दूसरे को समर्थन भी दे रहे थे। कई पोस्ट और टिप्पणियां इस तरह लिखी गई थीं, जैसे कोई व्यक्ति अपने परिचित से अपने बच्चे को लेकर चिंता साझा कर रहा हो।
इसी आधार पर शोधकर्ताओं ने तीन काल्पनिक दर्शक-प्रोफाइल तैयार किए। इनमें जेनिफर एक ऐसी मां थीं जो बच्चों के टीकाकरण को लेकर चिंतित थीं, पैट्रिक एक सेवानिवृत्त शिक्षक थे जो अपने पोते-पोतियों के भविष्य को लेकर चिंतित थे और एरन एक युवा व्यक्ति था जिसकी रुचि फिटनेस और तकनीक में थी।
इन प्रोफाइल के आधार पर अलग-अलग शैली में फेसबुक विज्ञापन तैयार किए गए। जेनिफर के लिए संदेशों में आम बोलचाल और संवेदनशील भाषा अपनाई गई। पैट्रिक के लिए विशेषज्ञतापूर्ण और प्रभावशाली शैली का इस्तेमाल किया गया, जबकि एरन के लिए प्रेरक भाषा रखी गई, जिसमें लोगों को खुद तथ्यों की जांच करने और पहल करने के लिए प्रोत्साहित किया गया।
इसके बाद इन विज्ञापनों की तुलना तटस्थ भाषा में तैयार किए गए विज्ञापनों से की गई। प्रत्येक जोड़ी में तस्वीर, विश्वसनीय सूचना का स्रोत और विज्ञापन की अन्य व्यवस्थाएं समान रखी गईं। अंतर मुख्य रूप से संदेश की भाषा और प्रस्तुति में था।
शोध के अनुसार, 12 में से 11 मामलों में लोगों ने उस विज्ञापन पर अधिक क्लिक किया, जिसकी भाषा संबंधित समुदाय के बोलचाल के अंदाज के ज्यादा करीब थी। स्कूली शिक्षा से जुड़े विज्ञापनों में परिचित भाषा वाले संदेश पर क्लिक करने की दर छह प्रतिशत रही, जबकि तटस्थ भाषा वाले संदेश पर यह दर 1.1 प्रतिशत थी। यानी परिचित भाषा वाले संदेश पर क्लिक करने की संभावना करीब पांच गुना अधिक रही।
टीकाकरण से जुड़े विज्ञापनों में भी अंतर देखा गया। परिचित भाषा में तैयार संदेशों पर 0.98 प्रतिशत लोगों ने क्लिक किया, जबकि तटस्थ भाषा वाले संदेशों पर क्लिक की दर 0.65 प्रतिशत रही। इससे संकेत मिलता है कि लोगों की भाषा और उनकी चिंताओं के अनुरूप तैयार किया गया संदेश विश्वसनीय जानकारी की ओर उनका ध्यान खींचने में अधिक प्रभावी हो सकता है।
हालांकि, शोधकर्ताओं ने यह स्पष्ट किया कि इन परिणामों का अर्थ यह नहीं है कि विज्ञापनों ने लोगों की सोच बदल दी। अध्ययन से यह भी पता नहीं चलता कि विज्ञापन पर क्लिक करने के बाद लोगों ने लिंक में मौजूद जानकारी वास्तव में पढ़ी या नहीं। इसके अलावा, फेसबुक की विज्ञापन प्रणाली ने भी यह निर्धारित किया कि कौन-सा विज्ञापन किन लोगों तक पहुंचेगा।
शोध में इस्तेमाल किए गए संदेशों में भाषा की कई विशेषताओं को एक साथ बदला गया था। इसलिए शोधकर्ता यह निश्चित रूप से नहीं बता सकते कि भाषा में किए गए किस एक बदलाव का सबसे ज्यादा प्रभाव पड़ा या लोगों को क्लिक करने के लिए किस विशेष तत्व ने प्रेरित किया।
इसके बावजूद, निष्कर्ष सार्वजनिक स्वास्थ्य अभियानों और गलत सूचना से निपटने की रणनीतियों के लिए उपयोगी हो सकते हैं। विश्वसनीय जानकारी तैयार करने वाली संस्थाएं यह समझ सकती हैं कि किसी समुदाय के लोग अपनी चिंताओं और सवालों को किस तरह व्यक्त करते हैं और उसी जानकारी को अलग-अलग भाषाई शैलियों में प्रस्तुत करके यह जांच सकती हैं कि कौन-सा तरीका लोगों का ध्यान बेहतर तरीके से आकर्षित करता है।
शोधकर्ताओं के अनुसार, इसका मतलब किसी समुदाय का सदस्य होने का दिखावा करना या लोगों के डर को बढ़ाना नहीं है। उद्देश्य ऐसी भाषा का इस्तेमाल करना है जो लोगों के वास्तविक सवालों और चिंताओं को सीधे संबोधित करे। उदाहरण के लिए टीकाकरण अभियान में माता-पिता की चिंता को ध्यान में रखते हुए उनसे सीधे पूछा जा सकता है कि वे अपने बच्चे को सुरक्षित रखना चाहते हैं और टीकाकरण के संभावित प्रभावों को लेकर उनके मन में क्या सवाल हैं।
आगे के शोध में यह भी समझने की जरूरत होगी कि ऐसी भाषा में दी गई जानकारी को लोग कितना समझते हैं और क्या इससे उन्हें अपने लिए सही निर्णय लेने का भरोसा बढ़ता है। यानी सोशल मीडिया पर विश्वसनीय जानकारी की चुनौती केवल सही तथ्य उपलब्ध कराने तक सीमित नहीं है, बल्कि यह भी महत्वपूर्ण है कि वह जानकारी लोगों तक किस भाषा और किस संवाद शैली में पहुंचाई जाए।