लखनऊ। बलरामपुर में कक्षा दो की सात वर्षीय छात्रा की स्कूल में अचानक तबीयत बिगड़ने और मौत के मामले ने अब इलाहाबाद हाईकोर्ट की लखनऊ पीठ का ध्यान खींचा है। स्कूल के पास गणेश विसर्जन जुलूस के दौरान तेज आवाज में डीजे बजने की बात सामने आने के बाद अदालत ने ध्वनि प्रदूषण के बढ़ते खतरे से जुड़े व्यापक सवालों पर गंभीर चिंता जताई है। हालांकि, अदालत ने अभी यह निष्कर्ष नहीं दिया है कि छात्रा की मौत तेज डीजे की आवाज के कारण ही हुई थी।
मामला बलरामपुर नगर के भगवतीगंज स्थित डिवाइन पब्लिक स्कूल का है। रिपोर्टों के अनुसार, 22 सितंबर को स्कूल में कक्षा दो की छात्रा वैष्णवी तिवारी की अचानक तबीयत बिगड़ गई और वह कक्षा में गिर पड़ी। उसे तत्काल अस्पताल ले जाया गया, जहां चिकित्सकों ने मृत घोषित कर दिया।
घटना के समय स्कूल के पास गणेश प्रतिमा विसर्जन जुलूस गुजर रहा था और वहां तेज आवाज में डीजे बजने की बात सामने आई थी। स्कूल प्रबंधन और परिजनों की ओर से भी घटना और तेज आवाज के बीच संबंध की बात कही गई, लेकिन मौत का वास्तविक चिकित्सकीय कारण जांच का विषय बना हुआ है।
इसी घटना और ध्वनि प्रदूषण से जुड़े व्यापक मुद्दे को देखते हुए इलाहाबाद हाईकोर्ट की लखनऊ पीठ ने स्वतः संज्ञान लेने का निर्देश दिया। न्यायमूर्ति राजन रॉय और न्यायमूर्ति मंजीव शुक्ला की पीठ पहले से प्रेशर हॉर्न, मॉडिफाइड साइलेंसर और हूटर के दुरुपयोग से संबंधित जनहित याचिका पर सुनवाई कर रही थी। अदालत ने कहा कि स्कूल के पास तेज आवाज में लाउडस्पीकर या संगीत बजाए जाने और उसके तुरंत बाद बच्ची के गिरने की घटना ध्वनि प्रदूषण के गंभीर पहलू पर अलग से विचार करने के लिए पर्याप्त है।
अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि छात्रा की मौत और ध्वनि प्रदूषण के बीच कारणात्मक संबंध पर अभी कोई अंतिम निष्कर्ष नहीं निकाला गया है। यह पहल इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि घटना के बाद अलग-अलग रिपोर्टों में तेज डीजे को बच्ची की तबीयत बिगड़ने से जोड़ा गया, जबकि प्रशासन ने मामले की चिकित्सकीय जांच भी शुरू कराई। बलरामपुर जिला प्रशासन ने बाद में मुख्य चिकित्सा अधिकारी की अध्यक्षता में मेडिकल कमेटी गठित कर घटना की परिस्थितियों की जांच के निर्देश दिए थे।
सुनवाई के दौरान पीठ ने पर्यावरण (संरक्षण) अधिनियम, 1986 और ध्वनि प्रदूषण (विनियमन एवं नियंत्रण) नियम, 2000 के बावजूद नियमों के उल्लंघन पर चिंता जताई। अदालत ने यह जानना चाहा कि ध्वनि प्रदूषण रोकने के लिए जिम्मेदार तंत्र किस तरह काम कर रहा है और नियमों के पालन की नियमित निगरानी के लिए क्या प्रभावी व्यवस्था मौजूद है। पीठ ने नागरिकों में जागरूकता बढ़ाने की आवश्यकता पर भी जोर दिया।
अदालत ने छात्रा के माता-पिता और स्कूल प्रशासन पर किसी तरह का दबाव नहीं बनाए जाने तथा स्कूल के कामकाज में अनावश्यक हस्तक्षेप नहीं करने की उम्मीद जताई। न्याय मित्र वरिष्ठ अधिवक्ता गौरव मेहरोत्रा को नई स्वतः संज्ञान वाली जनहित याचिका में सहयोग करने को कहा गया है। राज्य के अधिवक्ता को जिलाधिकारी और पुलिस अधीक्षक से संबंधित रिपोर्ट प्राप्त करने तथा अदालत के आदेश की प्रति स्कूल को उपलब्ध कराने के निर्देश दिए गए हैं।
इस मामले ने उत्तर प्रदेश में स्कूलों, अस्पतालों और अन्य संवेदनशील स्थानों के आसपास ध्वनि प्रदूषण के नियमों के पालन पर बहस तेज कर दी है। फिलहाल छात्रा की मौत का चिकित्सकीय कारण और तेज आवाज की भूमिका जांच का विषय है। इसलिए अंतिम निष्कर्ष जांच और उपलब्ध मेडिकल साक्ष्यों के आधार पर ही सामने आएगा।