बढ़ापा और भूलने की आदत अक्सर साथ-साथ चलते हैं लेकिन मेरे सहकर्मियों और मैंने पाया कि उम्र बढ़ने के साथ यादें वास्तव में पूरी तरह मिटती नहीं हैं, बल्कि कम सटीक हो जाती हैं। ‘सेरेब्रल कॉर्टेक्स’ पत्रिका में प्रकाशित हमारा अध्ययन बताता है कि उम्र बढ़ने के साथ मस्तिष्क उस खास अनुभव को हूबहू याद करने के बजाय उससे मिलते-जुलते उन अनुभवों को आपस में मिला देता है, जिसे आप याद करना चाहते हैं।
याददाश्त एक जटिल प्रक्रिया है। जब सब कुछ सामान्य रूप से काम कर रहा हो, तब भी किसी खास घटना को याद करने के तरीके में कई चरण शामिल होते हैं।
मान लीजिए, आपकी किसी दोस्त से बातचीत हुई। याददाश्त का पहला चरण उस समय शुरू होता है, जब आप बातचीत के दौरान उस घटना के अलग-अलग पहलुओं को महसूस करने के साथ ही समझ रहे होते हैं। दूसरे चरण में इन जानकारियों को आपके मस्तिष्क में सुरक्षित रखा जाता है।
तीसरा चरण तब आता है, जब एक सप्ताह बाद आप उस दोस्त के साथ हुई बातचीत को याद करना चाहते हैं और मस्तिष्क में सुरक्षित जानकारियों में से ठीक उसी घटना को तलाशते हैं। इसी अंतिम चरण को, यानी किसी जानकारी को फिर से याद करने की प्रक्रिया को, आम तौर पर लोग याददाश्त समझते हैं।
अब कल्पना कीजिए कि आपका मस्तिष्क उस दोस्त के साथ हुई बातचीत की जानकारी तलाशते समय गलती से उस बातचीत के कुछ विवरणों को उसी सुबह अपने जीवनसाथी के साथ हुई बातचीत के विवरणों से मिला देता है। इसके बाद जब आप दोस्त के साथ हुई बातचीत को याद करने की कोशिश करते हैं, तो वास्तव में आपके सामने जीवनसाथी के साथ हुई बातचीत की जानकारी आ जाती है। उम्र बढ़ने के साथ मस्तिष्क में होने वाली गड़बड़ी कुछ इसी तरह की हो सकती है।
यह क्यों महत्वपूर्ण है
लोगों और घटनाओं को याद रखना कई सामाजिक गतिविधियों के लिए महत्वपूर्ण है। किसी का नाम गलत याद करना शर्मिंदगी का कारण बन सकता है। यादों को लेकर इस तरह की गड़बड़ी का डर लोगों को सामाजिक रूप से अलग-थलग भी कर सकता है।
वैज्ञानिक पहले से जानते हैं कि यादों का आपस में गड़बड़ा जाना उन्हें पूरी तरह भूल जाने की तुलना में अधिक आम है। हालांकि, यह अभी स्पष्ट नहीं है कि मस्तिष्क में यह गड़बड़ी आखिर होती कैसे है।
मेरी टीम के अध्ययन का उद्देश्य यह समझना था कि याददाश्त की प्रक्रिया के किस चरण में इस तरह की गड़बड़ियां होती हैं और मस्तिष्क का स्मृति केंद्र हिप्पोकैम्पस इसमें क्या भूमिका निभाता है।
हिप्पोकैम्पस याददाश्त के सभी चरणों में शामिल होता है। याददाश्त के पहले चरण में यानी जब आप पहली बार अपने दोस्त से बातचीत कर रहे होते हैं तो मस्तिष्क में तंत्रिका कोशिकाओं के सक्रिय होने का जो पैटर्न बनता है, वह अक्सर उस याद को मस्तिष्क में सुरक्षित करते समय और बाद में उसे याद करते समय भी दोहराया जाता है।
अपने अध्ययन के लिए हमने युवा, अधेड़ और बुजुर्गों के मस्तिष्क की गतिविधियों को उस समय दर्ज किया, जब वे याददाश्त के इन्हीं तीन चरणों से गुजर रहे थे। मस्तिष्क की जांच के दौरान प्रतिभागियों को स्क्रीन के ऊपरी हिस्से में थोड़ी देर के लिए किसी व्यक्ति के चेहरे की तस्वीर दिखाई गई और नीचे किसी दृश्य या वस्तु, जैसे जंगल या सेब, की तस्वीर दिखाई गई।
हमने प्रतिभागियों से कहा कि वे कल्पना करें कि ऊपर दिखाई दे रहा व्यक्ति उस दृश्य में या उस वस्तु के साथ बातचीत कर रहा है। तस्वीरों की हर जोड़ी को एक अलग ‘‘घटना’’ माना गया।
इसके बाद प्रतिभागियों को 20 मिनट आराम करने दिया गया और इस दौरान हम उनके मस्तिष्क की गतिविधियां दर्ज करते रहे। इसके बाद याददाश्त की पड़ताल के दौरान प्रतिभागियों को ऊपर पहले दिखाई जा चुकी किसी व्यक्ति की तस्वीर दिखाई गई और उसके नीचे चार अन्य तस्वीरें रखी गईं। प्रतिभागियों को याद करना था कि इनमें से कौन-सी तस्वीर पहले उस व्यक्ति की तस्वीर के साथ दिखाई गई थी। हमने यह जांच कई बार दोहराई, ताकि यह पता लगाया जा सके कि अलग-अलग घटनाओं में चेहरे और दृश्यों या वस्तुओं के बीच संबंध को लोग कितनी अच्छी तरह याद रख पाते हैं।
हमने पाया कि युवाओं की तुलना में बुजुर्गों की यादों में गड़बड़ी अधिक हुई। उदाहरण के लिए, उनके इस बात को गलत तरीके से याद करने का अंदेशा अधिक था कि जिस चेहरे को शुरुआत में सेब की तस्वीर के साथ दिखाया गया था, वह जंगल की तस्वीर के साथ दिखाया गया था। बुजुर्गों में उस मस्तिष्कीय गतिविधि के पैटर्न को दोहराने की संभावना भी कम थी, जो किसी खास याद को पहली बार अनुभव करने, सुरक्षित रखने और बाद में याद करने के दौरान दिखाई दिया था।
हैरानी की बात यह थी कि जब बुजुर्गों ने मस्तिष्क की शुरुआती गतिविधि के पैटर्न को दोहराया भी, तब भी उनकी यादों में गड़बड़ी का अंदेशा और अधिक था।
हमारा अध्ययन इस बात के नए प्रमाण देता है कि उम्र बढ़ने के साथ ‘हिप्पोकैम्पस’ याददाश्त के अलग-अलग चरणों के बीच यादों में अनुचित तरीके से बदलाव करने लगता है।
अब भी कई सवालों के जवाब नहीं मिले।
हमारे अध्ययन समेत युवाओं पर किए गए शोध से पता चलता है कि किसी घटना को याद करते समय ‘हिप्पोकैम्पस’ में तंत्रिका कोशिकाओं के सक्रिय होने का वही पैटर्न बनना चाहिए, जो उस घटना को पहली बार अनुभव करते समय बना था।
लेकिन हमारे अध्ययन में जिन बुजुर्ग प्रतिभागियों की यादों में युवा प्रतिभागियों की तुलना में अधिक गड़बड़ी पाई गई, उनके मस्तिष्क में भी यही तंत्रिका पैटर्न दिखाई दिए। ऐसे में सवाल उठता है कि जब बुजुर्ग किसी घटना को सही-सही याद करते हैं, तब उनके मस्तिष्क में किस तरह की गतिविधि होती है? क्या ‘हिप्पोकैम्पस’ के अलावा मस्तिष्क के दूसरे हिस्से भी सही याददाश्त बनाए रखने में मदद करते हैं? हमारे अध्ययन में इन सवालों के स्पष्ट जवाब नहीं मिल सके।
अगला कदम क्या
शोधकर्ता अब भी यह समझने की कोशिश कर रहे हैं कि मस्तिष्क के अलग-अलग हिस्से एक-दूसरे के साथ किस तरह संवाद करते हैं। तंत्रिका विज्ञान के क्षेत्र में अगली बड़ी चुनौतियों में से एक यह समझना है कि हिप्पोकैम्पस में विद्युत संकेतों को सक्रिय करके याददाश्त कमजोर होने से कैसे रोका जा सकता है या खोई हुई यादों को कैसे वापस लाया जा सकता है।
भविष्य में किए जाने वाले उपायों का उद्देश्य ‘हिप्पोकैम्पस’ को मजबूत करना हो सकता है, ताकि याददाश्त सुरक्षित हो जाने के बाद उसमें बदलाव न हो। शोधकर्ताओं के पास इसके लिए पहले से कुछ विचार हैं, जिनमें व्यायाम, सजगता का अभ्यास, मस्तिष्क को विद्युत संकेत देना और यहां तक कि स्मार्टफोन में याददाश्त से जुड़े संकेत दर्ज करना भी शामिल हैं।
हालांकि, शोधकर्ताओं को अभी यह पता लगाना है कि ‘हिप्पोकैम्पस’ में बदलाव करने से क्या समय के साथ यादें स्थिर और एक जैसी बनी रह सकती हैं।
‘द रिसर्च ब्रीफ’ रोचक अकादमिक शोध पर संक्षिप्त जानकारी देने वाली शृंखला है।