मगरमच्छों के सबसे करीबी जीवित संबंधी आश्चर्यजनक रूप से शायद पक्षी हैं। ये दोनों ‘आर्कोसॉरिफॉर्म्स’ समूह के जीव हैं, जिनकी उत्पत्ति करीब 25 करोड़ वर्ष पहले ‘ट्रायसिक’ काल की शुरुआत के आसपास हुई थी।
यह समूह जल्द ही दो वंशों में बंट गया। एक से मगरमच्छ (स्यूडोसुकिया) और दूसरे से डायनासोर तथा फिर पक्षी (एवेमेटाटार्सालिया) विकसित हुए। इसके बाद दोनों वंशों का करीब 25 करोड़ वर्षों तक अलग-अलग विकास हुआ और इस दौरान उनमें बड़े बदलाव आए।
करोड़ों वर्षों के इस अंतराल ने इनकी साझा वंशावली के लगभग सभी प्रमाण मिटा दिए हैं। मगरमच्छ शीत-रक्त वाले जीव हैं, जिन्हें शरीर विज्ञान में ‘एक्टोथर्म’ कहा जाता है। उनके शरीर का तापमान पर्यावरण से निर्धारित होता है और उनकी चयापचय दर यानी भोजन को ऊर्जा में बदलने की शारीरिक प्रक्रिया की गति कम होती है। वे आम तौर पर सुस्त दिखाई देते हैं, लेकिन शिकार को डुबोते या आपस में लड़ते समय कुछ समय के लिए बेहद शक्तिशाली गतिविधि करते हैं।
पक्षी गर्म रक्त वाले यानी ‘एंडोथर्म’ होते हैं। उनकी चयापचय दर तेज होती है। वे अपने शरीर के तापमान को बढ़ाने और स्थिर रखने तथा लंबे समय तक उड़ान जैसी कठिन गतिविधि करने के लिए तेजी से पर्याप्त ऊर्जा पैदा करते हैं। पक्षी थककर आसमान से नीचे नहीं गिरते।
अगर मगरमच्छों के किसी तरह पंख होते तो भी चयापचय संबंधी ऊर्जा क्षमता में अंतर के कारण वे कभी उड़ नहीं पाते।
पक्षियों और मगरमच्छों में इतना अंतर कैसे आया? परंपरागत धारणा रही है कि उनके साझा पूर्वज पक्षियों के बजाय मगरमच्छों जैसे थे, लेकिन हमारे नए शोध से पता चलता है कि इसके विपरीत बात के सच होने की अधिक संभावना है।
परंपरागत धारणा
वैज्ञानिकों का मानना रहा है कि गर्म रक्त वाले जीवों का विकास शीत-रक्त वाले जीवों से हुआ। स्वयं गर्म रक्त वाले जीव होने के कारण मनुष्य यह मानता आया है कि गर्म रक्त वाले जीव शारीरिक रूप से शीत-रक्त वाले जीवों से बेहतर होते हैं।
इस तर्क के अनुसार, यदि जीवों का कोई समूह विकसित होकर गर्म रक्त वाला बन गया तो वह तेजी से विलुप्त हुए बिना शीत-रक्त वाली अवस्था में दोबारा नहीं लौट सकता।
इस दृष्टिकोण से यह मानना तर्कसंगत लगता है कि मगरमच्छों का वंश अपनी उत्पत्ति के समय से ही शीत-रक्त वाला रहा है। वैज्ञानिकों का मानना था कि गर्म रक्त वाली विशेषता केवल डायनासोर-पक्षी वंश में विकसित हुई थी।
नयी धारणा
मगरमच्छों का वंश मूल रूप से गर्म रक्त वाला था, इसका पहला संकेत जीवित मगरमच्छों के चार चैंबर (कक्षों) वाले हृदय से मिला। केवल गर्म रक्त वाले पक्षियों और स्तनधारियों के हृदय में चार चैंबर होते हैं तथा इसका गर्म रक्त वाली विशेषता से कार्यात्मक संबंध है।
गर्म रक्त वाले जीवों की उच्च चयापचय दर के लिए रक्त प्रवाह की तेज गति और उच्च रक्तचाप की आवश्यकता होती है।
इस प्रकार, आधुनिक मगरमच्छों का हृदय गर्म रक्त वाले जीवों जैसा है, लेकिन उनके शरीर में रक्त का प्रवाह और रक्तचाप शीत-रक्त वाले जीवों की तरह कम होता है। इससे संकेत मिलता है कि उनका हृदय मूल रूप से गर्म रक्त वाले जीव के रूप में जीवन जीने के लिए विकसित हुआ था।
चूंकि गर्म रक्त वाली प्रकृति का संबंध रक्त प्रवाह की तेज गति से है, इसलिए हमने तेज रक्त प्रवाह के अनुकूल बड़ी रक्त वाहिकाओं के जीवाश्म प्रमाणों की तलाश की। हमने पहले पाया था कि जीवित स्तनधारियों की टांगों की हड्डियों में रक्त वाहिकाओं के गुजरने के लिए बने छिद्र शीत-रक्त वाले जीवितसरीसृपों के ऐसे छिद्रों की तुलना में अपेक्षाकृत काफी बड़े होते हैं।
हमने डायनासोर की 10 प्रजातियों की हड्डियों के इन छिद्रों की जांच की और पुष्टि की कि वे भी गर्म रक्त वाले थे। हालांकि, हमारे पास शुरुआती आर्कोसॉर या मगरमच्छ वंश के प्राचीन प्राणियों से संबंधित कोई माप उपलब्ध नहीं था।
जमीन पर सक्रिय रहने वाले जीवों से पानी में घात लगाकर शिकार करने वाले जीव बनने तक
मगरमच्छ वंश के इतिहास से संबंधित नयी धारणा की शुरुआत ट्रायसिक काल से होती है। उस समय वे जमीन पर रहने वाले सक्रिय एवं गर्म रक्त वाले जीव थे और उनमें से कई दो पैरों पर भी दौड़ते थे। जुरासिक और क्रिटेशियस काल के दौरान उनकी सैकड़ों प्रजातियां विकसित हुईं, जो जमीन, खारे और मीठे पानी तथा इनके बीच के क्षेत्रों में रहती थीं। हालांकि, वे हाल के समय तक गर्म रक्त वाले ही बने रहे।
उनकी चयापचय दर धीमी क्यों हुई?
हमारा मानना है कि इसका संबंध पानी में घात लगाकर शिकार करने के उनके मौजूदा व्यवहार से हो सकता है। शीत-रक्त वाली प्रकृति के कारण चयापचय दर कम होने से वे अधिक समय तक सांस रोक सकते हैं। इससे उन्हें शिकार की प्रतीक्षा करते और उसे डुबोते समय छिपे रहने में मदद मिलती है।
वर्तमान में पानी में घात लगाकर शिकार करने वाला गर्म रक्त वाला कोई भी जीव नहीं है। गर्म रक्त वाले जीव इतनी देर तक सांस रोक ही नहीं सकते।
शीत-रक्त वाली चयापचय प्रणाली को दोबारा अपनाने के कारण शायद मगरमच्छ वंश 6.6 करोड़ वर्ष पहले विलुप्त होने से बच गया। उस समय एक क्षुद्रग्रह (एस्टेरॉयड) के टकराने से पक्षियों को छोड़कर डायनासोर के अधिकतर वंश समाप्त हो गए थे।
द कन्वरसेशन










