हाल के दिनों में मीडिया में आई खबरों से ऐसे कई मामले सामने आए हैं, जिनमें फेसबुक ने ऐसी सामग्री के लिए भी भुगतान किया है जिसे विवादित माना जा सकता है।
‘एबीसी न्यूज वेरिफाई’ की जांच में सामने आया कि फेसबुक ने ऑस्ट्रेलिया के कुछ ऐसे सोशल मीडिया खातों को भी कमाई की सुविधा दी, जिनके संबंध कथित तौर पर गोरे राष्ट्रवादी, नव-नाजी या टीका विरोधी समूहों से बताए गए हैं। रिपोर्ट के अनुसार, इनमें से कुछ अकाउंट की सामग्री मेटा की कमाई की अपनी नीतियों से भी मेल नहीं खाती थी।
मेटा ने इन व्यक्तिगत पेज पर पूछे गए सवालों का जवाब नहीं दिया और यह भी सार्वजनिक नहीं किया कि इनसे कितनी कमाई हुई। हालांकि, कंपनी ने कहा कि यदि कोई क्रिएटर उसकी नीतियों का उल्लंघन करता है तो उसकी कमाई बंद की जा सकती है और बार-बार नियम तोड़ने पर उसे सोशल मीडिया मंच से हटाया भी जा सकता है।
विवादित भाषण को केवल ऑनलाइन उपलब्ध रहने देना और उसके लिए भुगतान करना, दो अलग-अलग चीजें हैं। भुगतान करने से सोशल मीडिया मंच और पोस्ट करने वाले लोगों के बीच व्यावसायिक संबंध बन जाता है। इससे क्रिएटर को ऐसी सामग्री अधिक बनाने का प्रोत्साहन मिलता है जो ज्यादा लोगों का ध्यान आकर्षित करे।
इंडोनेशिया, भारत और चीन जैसे देशों में कुछ ‘‘मीम फैक्टरी’’ इसी व्यवस्था का फायदा उठाती हैं।
तो यह व्यवस्था काम कैसे करती है और इसका इंटरनेट पर दिखाई देने वाली सामग्री पर क्या असर पड़ता है?
फेसबुक की ‘कंटेंट’ (सामग्री) मुद्रीकरण व्यवस्था कैसे काम करती है:
मेटा ने वर्ष 2024 में फेसबुक सामग्री मुद्रीकरण कार्यक्रम शुरू किया। इसमें पहले से मौजूद कमाई की कई सुविधाओं, जैसे रील पर विज्ञापन, को एक साथ जोड़ा गया। पात्र क्रिएटर वीडियो, स्टोरी, फोटो और लिखित पोस्ट से पैसा कमा सकते हैं।
यह कार्यक्रम अभी भी आमंत्रण आधारित है। मेटा यह सार्वजनिक नहीं करता कि किन लोगों को इसमें शामिल होने का मौका मिलेगा। हालांकि, क्रिएटर इसमें शामिल होने के लिए अपनी रुचि दर्ज करा सकते हैं।
मेटा के अनुसार, यह व्यवस्था प्रदर्शन आधारित है। यानी किसी कंटेंट को जितने अधिक लोगों की प्रतिक्रिया, देखने की अवधि और जुड़ाव मिलता है, क्रिएटर को उतना अधिक पैसा मिल सकता है।
वर्ष 2025 में फेसबुक ने क्रिएटर को करीब तीन अरब अमेरिकी डॉलर का भुगतान किया। इस साल मार्च में कंपनी ने कहा कि अब भुगतान में ‘‘व्यूज’’, अधिक समय तक देखने और गहरे जुड़ाव को ज्यादा महत्व दिया जाएगा।
क्रिएटर प्रति एक हजार पात्र ‘व्यूज’ के आधार पर अनुमानित कमाई दर देख सकते हैं, लेकिन मेटा यह सार्वजनिक नहीं करता कि वह इन संकेतकों को किस तरह महत्व देता है और किसी व्यक्ति की कमाई कैसे तय करता है।
इस पूरी व्यवस्था में तीन अलग-अलग स्तर हैं। सामुदायिक मानक यह तय करते हैं कि कोई सामग्री फेसबुक पर रहने योग्य है या नहीं। वितरण और सुझाव प्रणाली यह तय करती है कि सामग्री कितने लोगों तक पहुंचेगी। मुद्रीकरण नियम यह तय करते हैं कि पात्र सामग्री से पैसा कमाया जा सकता है या नहीं।
मेटा भी इन तीनों स्तरों को अलग-अलग मानता है। कोई सामग्री मंच पर रहने की अनुमति पा सकती है, लेकिन उसे लोगों को कम दिखाया जा सकता है। उदाहरण के लिए, यदि मेटा उसे कम गुणवत्ता वाली मानती है। वहीं, कोई सामग्री नियमों के अनुसार उपयुक्त होने के बावजूद कमाई योग्य नहीं हो सकती, क्योंकि उसका क्रिएटर इस कार्यक्रम का हिस्सा नहीं है।
संक्षेप में, फेसबुक पर किसी सामग्री का मौजूद होना, उसका तेजी से प्रसार होना और उससे पैसा मिलना — ये तीनों अलग-अलग चीजें हैं।
भड़काऊ सामग्री से भी क्यों हो सकती है कमाई?
मेटा के पास फेसबुक सामग्री को नियंत्रित करने के लिए नियम हैं, लेकिन समस्या यह है कि सामग्री की रैंकिंग, सुझाव, भुगतान और नियम लागू करने वाली अलग-अलग व्यवस्थाएं बड़े स्तर पर हमेशा एक तरह से काम नहीं कर पातीं।
डिजिटल मीडिया व्यवस्था के अध्ययन में विशेषज्ञ ‘‘मीडियालॉजी’’ शब्द का इस्तेमाल करते हैं, जिसके तहत डिजिटल प्रणालियों को इंटरफेस, आंकड़ों, संस्थाओं, व्यावसायिक हितों और आम लोगों की गतिविधियों के जुड़े हुए ढांचे के रूप में देखा जाता है। इससे यह समझने में मदद मिलती है कि समस्या केवल किसी एक ‘‘एल्गोरिदम’’ की वजह से नहीं होती।
फेसबुक की क्रिएटर अर्थव्यवस्था लोगों की प्रतिक्रिया को आंकड़ों में बदल देती है। देखने, प्रतिक्रिया देने और साझा करने जैसी गतिविधियों को मापा जाता है और उसी आधार पर सामग्री की पहुंच और आर्थिक मूल्य तय होता है।
क्रिएटर इन आंकड़ों का इस्तेमाल करते हैं। वे यह समझने की कोशिश करते हैं कि कौन-से विषय, तरीके और भाषा लोगों को ज्यादा आकर्षित करते हैं।
शोध बताते हैं कि भावनात्मक और नैतिक रूप से तीखी भाषा वाली सामग्री को अधिक साझा किए जाने की संभावना हो सकती है। एक व्यापक अध्ययन में पाया गया कि नैतिक भावनाओं से जुड़ी भाषा कई विषयों में साझा किए जाने से संबंधित थी। एक अन्य अध्ययन में सामने आया कि गलत सूचनाएं अक्सर भरोसेमंद खबरों की तुलना में ज्यादा आक्रोश पैदा करती हैं और यही आक्रोश उनके प्रसार में मदद करता है।
इसका अर्थ यह नहीं है कि हर गुस्से वाली पोस्ट सफल होती है या केवल सुझाव प्रणाली ही समाज में ध्रुवीकरण के लिए जिम्मेदार है। गलत सूचना और कट्टरपंथी सामग्री का प्रभाव अक्सर कुछ सीमित समूहों तक अधिक केंद्रित रहता है और दर्शकों की मांग भी इसमें भूमिका निभाती है।
लेकिन जब भुगतान किसी सामग्री के प्रदर्शन पर निर्भर करता है और उकसाने वाली सामग्री ज्यादा ध्यान खींचती है, तो हानिकारक सामग्री आर्थिक रूप से लाभदायक बन सकती है, जब तक कि सोशल मीडिया मंच अपनी नीतियों को प्रभावी ढंग से लागू न करे।
क्या अन्य मंच भी ऐसा कर रहे हैं? पूरी तरह इसी तरीके से नहीं।
यूट्यूब विज्ञापन और सदस्यता से होने वाली कमाई का हिस्सा साझा करता है।
इसकी शर्तों के तहत, क्रिएटर को ‘नेट वाच-पेज’ विज्ञापन राजस्व का 55 प्रतिशत और ‘शॉर्ट्स’ राजस्व का 45 प्रतिशत हिस्सा मिलता है। विज्ञापनदाताओं के लिए बनाए गए अलग नियमों की वजह से नफरत फैलाने वाले, भड़काऊ या अपमानजनक कंटेंट से होने वाली कमाई सीमित हो सकती है, भले ही वीडियो ऑनलाइन बना रहे।
एक्स (पूर्व में ट्विटर) भी अपनी कमाई व्यवस्था में बदलाव कर रहा है। पात्र क्रिएटर को प्रीमियम उपयोगकर्ताओं की ‘होम फीड’ पर पोस्ट के प्रदर्शन के आधार पर कमाई का अवसर दिया जा रहा है। भ्रामक सामग्री, वयस्क सामग्री और नफरत या कट्टरपंथ से जुड़ी सामग्री को प्रतिबंधित किया जा सकता है।
जवाबदेही के लिए जरूरी है कि मंच सार्वजनिक रूप से यह जानकारी दें कि किन खातों और किस तरह की सामग्री को भुगतान मिल रहा है। सुझाव प्रणाली और कमाई के फैसलों की स्वतंत्र जांच होनी चाहिए। बार-बार नियम तोड़ने वाले खातों की कमाई समय पर बंद की जानी चाहिए और इसकी समीक्षा की व्यवस्था भी होनी चाहिए।
(द कन्वरसेशन)










