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New Study: क्या ह्दयाघात वाले मरीजों के रक्त में अधिक होते हैं सूक्ष्म प्लास्टिक कण?

ब्यूरो पब्लिकन्यूज़360 by ब्यूरो पब्लिकन्यूज़360
July 19, 2026
in Featured
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New Study: क्या ह्दयाघात वाले मरीजों के रक्त में अधिक होते हैं सूक्ष्म प्लास्टिक कण?

सूक्ष्म प्लास्टिक कण (माइक्रोप्लास्टिक) आज दुनिया के सामने सबसे बड़ी पर्यावरणीय चुनौतियों में से एक है। ये समुद्रों, पीने के पानी, समुद्री भोजन और हमारी सांसों की हवा में तो पहले ही मिल चुके हैं। अब ये मानव शरीर के लगभग हर हिस्से- प्लेसेंटा (गर्भनाल) से लेकर मस्तिष्क तक में भी पाए जा रहे हैं।

इटली के शोधकर्ताओं द्वारा ‘यूरोपियन हार्ट जर्नल’ में प्रकाशित एक नए अध्ययन ने इस सूची में एक और अंग जोड़ दिया है—हृदय को रक्त पहुंचाने वाली कोरोनरी धमनियां। हालांकि कोरोनरी रक्त में सूक्ष्म प्लास्टिक कण का मिलना चिंता का विषय है, लेकिन अध्ययन का सबसे दिलचस्प निष्कर्ष प्लास्टिक नहीं, बल्कि यह है कि ये वहां तक पहुंच कैसे रहे हैं।

शोधकर्ताओं ने पाया कि धूम्रपान करने वाले लोगों में, धूम्रपान न करने वालों की तुलना में हृदय को रक्त पहुंचाने वाली धमनियों में सूक्ष्म प्लास्टिक और अति सूक्ष्म प्लास्टिक कण पाए जाने की आशंका छह गुना अधिक थी। इससे भी अधिक महत्वपूर्ण बात यह रही कि जो लोग धूम्रपान करते थे और साथ ही अत्याधिक प्रदूषित माहौल में रहे, उनमें से हर व्यक्ति के रक्त में प्लास्टिक के कण पाए गए।

इसके विपरीत, जो लोग न तो धूम्रपान करते थे और न ही अधिक प्रदूषित माहौल में रहते थे, उनमें केवल 12.5 प्रतिशत लोगों के रक्त में ऐसे कण मिले। अपेक्षाकृत छोटे अध्ययन में भी यह अंतर बेहद उल्लेखनीय है।

ये निष्कर्ष केवल धूम्रपान के एक और दुष्प्रभाव की पुष्टि नहीं करते, बल्कि एक नए निष्कर्ष भी सामने रखते हैं कि सिगरेट शायद सूक्ष्म प्लास्टिक कणों को शरीर के भीतर पहुंचाने का एक प्रभावी माध्यम भी हो सकती है।

दशकों से वैज्ञानिक जानते हैं कि धूम्रपान हृदय और रक्त वाहिकाओं को कैसे नुकसान पहुंचाता है। तंबाकू के धुएं में हजारों ऐसे रसायन होते हैं, जो शरीर में सूजन बढ़ाते हैं, रक्त वाहिकाओं को क्षति पहुंचाते हैं, रक्त के थक्के बनने की आशंका बढ़ाते हैं और धमनियों में वसा जमा होने की प्रक्रिया को तेज कर देते हैं।

नया अध्ययन संकेत देता है कि इन स्थापित जोखिमों के साथ-साथ एक और प्रक्रिया भी काम कर सकती है। सिगरेट के धुएं में अत्यंत सूक्ष्म कण बड़ी मात्रा में होते हैं, जो फेफड़ों के सबसे भीतर तक पहुंच जाते हैं। शोधकर्ताओं का मानना है कि सांस के जरिए अंदर गए सूक्ष्म प्लास्टिक और अति सूक्ष्म प्लास्टिक इन्हीं कणों के साथ फेफड़ों की ‘एल्वियोली’ को पार कर पहले की तुलना में कहीं अधिक आसानी से रक्त प्रवाह में प्रवेश कर सकते हैं। वायु प्रदूषण भी इसी तरह की प्रक्रिया को बढ़ावा दे सकता है।

इसका यह अर्थ नहीं है कि रक्त में मिले सभी प्लास्टिक कण सीधे सिगरेट से आए हों, हालांकि अधिकांश सिगरेट फिल्टर प्लास्टिक आधारित सेलूलोज एसीटेट से बने होते हैं और उनका भी कुछ योगदान हो सकता है। दरअसल, धूम्रपान करने वाले लोग पहले से ही उस हवा में मौजूद सूक्ष्म प्लास्टिक कणों को सांस के जरिए अंदर लेते हैं, जो सिंथेटिक कपड़ों के रेशों, टायरों के घिसने, खराब हो चुकी प्लास्टिक पैकेजिंग और अनेक अन्य पर्यावरणीय स्रोतों से उत्पन्न होते हैं। संभव है कि धूम्रपान केवल इन कणों को फेफड़ों से रक्त प्रवाह तक पहुंचने का रास्ता आसान बना देता हो।

अध्ययन में 61 ऐसे मरीजों को शामिल किया गया, जिनकी कोरोनरी एंजियोग्राफी की जा रही थी। शोधकर्ताओं ने तीन समूहों की तुलना की—हाल में दिल का दौरा झेल चुके लोग, स्थिर कोरोनरी धमनी रोग वाले मरीज और सामान्य कोरोनरी धमनियों वाले लोग।

दिल का दौरा झेल चुके 84 प्रतिशत मरीजों के रक्त में सूक्ष्म प्लास्टिक और अति सूक्ष्म प्लास्टिक कण मिले। वहीं, दीर्घकालिक कोरोनरी धमनी रोग वाले मरीजों में यह आंकड़ा 40 प्रतिशत और सामान्य कोरोनरी धमनियों वाले लोगों में 32 प्रतिशत रहा। ह्दयाघत वाले मरीजों में प्लास्टिक के विभिन्न प्रकार के पॉलिमर भी अधिक मात्रा में मिले, जिनमें पैकेजिंग में व्यापक रूप से इस्तेमाल होने वाला पॉलीएथिलीन सबसे अधिक मिला।

महत्वपूर्ण बात यह भी रही कि जिन मरीजों के रक्त में प्लास्टिक कण मिले, उनमें सूजन (इन्फ्लेमेशन) के संकेतक भी अधिक थे। चूंकि सूजन धमनियों में जमा वसा को अस्थिर करने और दिल का दौरा पड़ने में अहम भूमिका निभाती है, इसलिए इस जैविक संबंध पर और गहराई से अध्ययन किए जाने की आवश्यकता है।

फिलहाल इसे अंतिम प्रमाण नहीं माना जा सकता

हालांकि यह अध्ययन यह साबित नहीं करता कि सूक्ष्म प्लास्टिक कण ही दिल का दौरा पड़ने का कारण हैं। अध्ययन में हिस्सा लेने वालों की संख्या कम थी और यह एक प्रेक्षण अध्ययन था। यानी शोधकर्ताओं ने केवल दोनों के बीच संबंध देखा, लेकिन यह नहीं कहा जा सकता कि एक कारण दूसरे का परिणाम है।

धूम्रपान करने वाले लोग अक्सर अधिक प्रदूषित माहौल का सामना करते हैं और उनकी जीवनशैली के कई अन्य पहलू भी हृदय रोग के जोखिम को प्रभावित कर सकते हैं। इसके अलावा, दिल का दौरा पड़ने के बाद उपचार के दौरान मरीजों को नसों के माध्यम से दिए जाने वाले तरल पदार्थ और चिकित्सा उपकरण भी रक्त के नमूनों में सूक्ष्म प्लास्टिक कण पहुंचा सकते हैं।

ऐसी सावधानी इसलिए भी जरूरी है क्योंकि सूक्ष्म प्लास्टिक कण आज व्यापक सार्वजनिक चर्चा का विषय बन चुका है। लेकिन विज्ञान इस तरह काम नहीं करता। हर नया अध्ययन केवल एक बड़े और जटिल पहेली का नया हिस्सा जोड़ता है।

चाहे भविष्य में सूक्ष्म प्लास्टिक कण हृदय रोगों का प्रत्यक्ष कारण साबित हों या नहीं, यह अध्ययन एक व्यापक संदेश अवश्य देता है—हमारे हृदय का स्वास्थ्य केवल हमारी आनुवंशिक संरचना या व्यक्तिगत जीवनशैली से तय नहीं होता, बल्कि उस वातावरण से भी प्रभावित होता है जिसमें हम रहते हैं।

वायु प्रदूषण को पहले ही दुनियाभर में हृदय रोगों का एक प्रमुख कारण माना गया है। वहीं, धूम्रपान समय से पहले होने वाली उन मौतों का एक प्रमुख कारण है, जिन्हें रोका जा सकता है। यदि ये दोनों कारक पर्यावरण में मौजूद प्लास्टिक कणों को रक्त प्रवाह तक पहुंचाने में भी भूमिका निभाते हैं, तो संभव है कि ये अलग-अलग नहीं, बल्कि एक-दूसरे से जुड़े हुए जोखिम हों।

यह विचार ‘एक्सपोजोम’ की उभरती अवधारणा से मेल खाता है। एक्सपोजोम का अर्थ है—जीवनभर हमारे शरीर पर पड़ने वाले सभी पर्यावरणीय प्रभावों का कुल योग। अब शोधकर्ता तंबाकू के धुएं, वायु प्रदूषण और प्लास्टिक प्रदूषण को अलग-अलग देखने के बजाय यह समझने का प्रयास कर रहे हैं कि ये सभी कारक मिलकर किस प्रकार स्वास्थ्य को प्रभावित करते हैं।

अध्ययन का सबसे प्रभावशाली आंकड़ा भी शायद सबसे सरल है—जो प्रतिभागी धूम्रपान करते थे और साथ ही अधिक प्रदूषित माहौल में रहे उनमें हर व्यक्ति के रक्त में प्लास्टिक के कण मिले। जबकि जो लोग न धूम्रपान करते थे और न ही अधिक प्रदूषित माहौल में रहे उनमें आठ में केवल एक व्यक्ति के रक्त में ऐसे कण पाए गए।

यह छोटा अध्ययन यह साबित नहीं करता कि प्लास्टिक कणों ने हृदय रोग पैदा किए, लेकिन यह जरूर याद दिलाता है कि धूम्रपान केवल जहरीले रसायनों का स्रोत नहीं है।

द कन्वरसेशन

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