इलेक्ट्रॉनिक्स और सूचना प्रौद्योगिकी मंत्रालय ने एआई से बने डीपफेक कंटेंट पर संशोधित दिशा-निर्देश जारी किए हैं। कानूनी विशेषज्ञों ने इन नए नियमों का स्वागत किया है और कहा है कि ये पहले के प्रस्ताव की तुलना में अधिक व्यावहारिक और संतुलित हैं।
नए नियमों के तहत सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म जैसे फेसबुक, इंस्टाग्राम और यूट्यूब को एआई से तैयार या बदले गए कंटेंट को स्पष्ट रूप से लेबल करना होगा। इस तरह के कंटेंट में या तो साफ दिखाई देने वाला खुलासा (डिस्क्लोजर) होगा या फिर उसमें तकनीकी पहचान चिह्न यानी मेटाडाटा जोड़ा जाएगा। इससे उपयोगकर्ता को पता रहेगा कि वह जो सामग्री देख रहा है, वह कृत्रिम रूप से बनाई गई है।
मंत्रालय द्वारा सूचना प्रौद्योगिकी (इंटरमीडियरी गाइडलाइंस और डिजिटल मीडिया एथिक्स कोड) नियम, 2021 में किए गए संशोधन के तहत अब सरकार और नियामक संस्थाएं सिंथेटिक जनरेटेड सूचना, यानी डीपफेक जैसी सामग्री की निगरानी कर सकेंगी।
विशेषज्ञों का कहना है कि संशोधित नियम पहले के मसौदे से अलग हैं। पहले प्रस्ताव में हर तरह के एआई से बने कंटेंट को चिन्हित करने की बात थी, लेकिन अब फोकस केवल भ्रामक या गुमराह करने वाली सामग्री पर किया गया है। इससे नियम ज्यादा व्यावहारिक हो गए हैं।
एक महत्वपूर्ण बदलाव यह भी है कि यदि सरकार या अदालत किसी डीपफेक सामग्री को हटाने का आदेश देती है, तो सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म को उसे तीन घंटे के भीतर हटाना होगा। पहले यह समय सीमा 36 घंटे थी।
नए नियमों में यह भी स्पष्ट किया गया है कि एक बार एआई लेबल या मेटाडाटा लगा दिए जाने के बाद उसे हटाया या दबाया नहीं जा सकेगा। प्लेटफॉर्म को अवैध, यौन शोषण से जुड़ी या भ्रामक एआई सामग्री को पहचानने और रोकने के लिए ऑटोमेटेड टूल्स का इस्तेमाल करना होगा।
कानूनी विशेषज्ञों का मानना है कि ‘उचित प्रयास’ की अपेक्षा वाले प्रावधान से सोशल मीडिया कंपनियों को राहत मिलेगी। पहले अनिवार्य दृश्य लेबलिंग की सख्त शर्त थी, जिसे कंपनियां चुनौतीपूर्ण मान रही थीं।
कुल मिलाकर ये संशोधित दिशा-निर्देश एआई तकनीक के बढ़ते उपयोग के बीच संतुलन बनाने की कोशिश हैं। एक ओर अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता बनी रहे और दूसरी ओर भ्रामक और खतरनाक डीपफेक सामग्री पर रोक लगे।




