नयी दिल्ली, दिल्ली उच्च न्यायालय ने शुक्रवार को दो न्यायिक अधिकारियों के खिलाफ प्रशासनिक जांच का आदेश दिया। दोनों न्यायिक अधिकारियों पर एक महिला वकील को एक अन्य वकील के खिलाफ दर्ज कराए गए बलात्कार के मामले में आरोप वापस लेने के लिए मजबूर करने का आरोप है।
उच्च न्यायालय ने 51 वर्षीय आरोपी वकील की अग्रिम जमानत रद्द कर दी और कहा कि जमानत रद्द करने का एक मुख्य आधार कानूनी प्रक्रिया में हस्तक्षेप करना है।
देर रात अपलोड किए गए एक आदेश में न्यायमूर्ति अमित महाजन ने कहा कि मामले में दोनों पक्षों ने ‘‘न्याय का उपहास’’ किया है।
न्यायाधीश ने कहा, ‘‘वर्तमान कार्यवाही में सामने आई परिस्थितियां इतनी विकट हैं कि उन्होंने इस न्यायालय की अंतरात्मा को झकझोर दिया है। इससे यह स्पष्ट होता है कि न्याय प्रशासन में स्पष्ट हस्तक्षेप है।
उच्च न्यायालय ने कहा कि वह इस तरह के मामले में न्यायिक अधिकारियों की ‘‘संलिप्तता’’ से स्तब्ध है।
न्यायालय ने कहा कि हालांकि आरोपों की आगे जांच की जानी है, लेकिन ये ‘‘आपराधिक न्याय तंत्र के प्रति घोर अनादर’’ का संकेत देते हैं।
अपनी शिकायत में, 27 वर्षीय महिला वकील ने आरोप लगाया कि वह एक दोस्त के माध्यम से आरोपी वकील से मिली थी और एक पार्टी के लिए उसके घर गई थी, जहां आरोपी ने महिला वकील के साथ बलात्कार किया और बाद में उससे शादी करने का वादा किया क्योंकि वह एक विधुर था।
महिला ने आरोप लगाया कि आरोपियों के कुछ न्यायिक अधिकारियों के साथ घनिष्ठ संबंध थे और उन्होंने प्राथमिकी दर्ज होने से पहले और बाद में भी उससे संपर्क करने और उसे प्रभावित करने का प्रयास किया था।




