नयी दिल्ली, संसद की एक समिति ने सरकार से कृत्रिम बुद्धिमत्ता (एआई) का इस्तेमाल कर गढ़ी गई फर्जी खबरों को फैलाने के लिए जिम्मेदार व्यक्तियों एवं संस्थानों की पहचान करने और उन पर मुकदमा चलाने के लिए ठोस कानूनी व तकनीकी समाधान विकसित करने को कहा है।
समिति ने कहा है कि इस प्रौद्योगिकी का उपयोग गलत सूचना का पता लगाने के लिए किया जा रहा है, लेकिन यह गलत सूचना का स्रोत भी हो सकती है।
भाजपा सांसद निशिकांत दुबे की अध्यक्षता वाली समिति की मसौदा रिपोर्ट हाल में लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला को सौंपी गई। इसे अगले सत्र में संसद में पेश किया जाएगा।
सूत्रों के अनुसार, समिति ने सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय, इलेक्ट्रॉनिक्स एवं सूचना प्रौद्योगिकी मंत्रालय (एमईआईटीवाई) तथा अन्य संबंधित मंत्रालयों एवं विभागों के बीच करीबी समन्वय का भी आग्रह किया, ताकि एआई जनित फर्जी खबरों के प्रसार के लिए जिम्मेदार व्यक्तियों और संस्थानों की पहचान करने और उन पर मुकदमा चलाने के लिए ठोस कानूनी एवं तकनीकी समाधान विकसित किए जा सकें।
समिति ने एआई सामग्री निर्माताओं के लिए लाइसेंसिंग आवश्यकताओं की व्यवहार्यता का पता लगाने तथा एआई-जनित वीडियो और सामग्री की अनिवार्य ‘लेबलिंग’ के लिए अंतर-मंत्रालयी समन्वय की सिफारिश की है।
समिति के सुझाव सरकार के लिए बाध्यकारी नहीं हैं। हालांकि, सरकार अक्सर इन्हें लागू करने पर विचार करती है, क्योंकि संसदीय समितियां संसद का प्रतिनिधित्व करती हैं।
रिपोर्ट में कहा गया है कि फर्जी खबरों का पता लगाने के लिए वर्तमान में दो परियोजनाएं कार्यान्वित की जा रही हैं — ‘डीप लर्निंग फ्रेमवर्क’ का उपयोग करके फर्जी भाषण का पता लगाना तथा ‘डीपफेक वीडियो’ और छवियों का पता लगाने के लिए सॉफ्टवेयर का डिजाइन और विकास।
समिति ने कहा कि प्रौद्योगिकी में प्रगति, विशेष रूप से एआई में, फर्जी खबरों से संबंधित चिंताओं को दूर करने के लिए आशाजनक समाधान प्रस्तुत करती है। साथ ही, संबंधित मंत्रालयों के इस दृष्टिकोण को रेखांकित किया कि एआई विकसित हो रहा है और यह इंटरनेट पर पहले से उपलब्ध जानकारी के उपयोग पर काम करता है।
मंत्रालयों ने समिति को बताया कि वर्तमान स्थिति में, इसका उपयोग तथ्य-जांच जैसे जटिल विषय के लिए नहीं किया जा सकता।
हालांकि, समिति ने कहा कि एआई का उपयोग संभावित रूप से फर्जी खबरों और भ्रामक सामग्री को मानवीय हस्तक्षेप द्वारा समीक्षा के लिए चिह्नित करने के वास्ते निगरानी के दूसरे स्तर के रूप में किया जा सकता है।
समिति ने कहा कि विभिन्न शोध परियोजनाएं और पहल फर्जी खबरों से निपटने में एआई के उपयोग की संभावना तलाश रही हैं।
रिपोर्ट के अनुसार, ‘‘गलत और भ्रामक सूचनाओं का पता लगाने, उनकी पुष्टि करने और उनके प्रसार को रोकने के लिए एआई और मशीन लर्निंग तकनीकों का तेजी से उपयोग किया जा रहा है।’’
समिति ने विभिन्न हितधारकों के साथ महीनों की बातचीत के बाद व्यापक सिफारिशें कीं। इसने फर्जी खबरों को लोक व्यवस्था और लोकतांत्रिक प्रक्रिया के लिए एक ‘‘गंभीर खतरा’’ बताया और इस मुद्दे से निपटने के लिए दंडात्मक प्रावधानों में संशोधन, जुर्माना बढ़ाने और जवाबदेही तय करने का आह्वान किया।
इसने सभी प्रिंट, डिजिटल और इलेक्ट्रॉनिक मीडिया संस्थानों में तथ्य-जांच तंत्र और एक आंतरिक लोकपाल की अनिवार्य उपस्थिति का भी समर्थन किया।
हालांकि, समिति ने यह भी कहा है कि इसमें मीडिया संस्थानों और संबंधित हितधारकों के बीच आम सहमति बनाने की प्रक्रिया शामिल होनी चाहिए और उसी से यह उभरकर सामने आना चाहिए।


