इसमें कोई संदेह नहीं है कि नींद मस्तिष्क के लिए अच्छी है। यह विभिन्न भागों को पुनर्जीवित करने और यादों को स्थिर करने में मदद करती है।
जब हम पर्याप्त नींद नहीं लेते हैं, तो इससे तनाव का स्तर बढ़ सकता है और मानसिक स्वास्थ्य संबंधी समस्याएं बढ़ सकती हैं।
साक्ष्य इस धारणा का भी समर्थन करते हैं कि जागते रहने की तुलना में सोते वक्त हमारा मस्तिष्क अधिक विषाक्त अपशिष्ट से छुटकारा पाता है। यह प्रक्रिया संभावित रूप से हानिकारक चीजों जैसे कि एमिलॉयड से छुटकारा पाने में महत्वपूर्ण मानी जाती है। एमिलॉयड प्रोटीन मस्तिष्क में होने वाले अल्जाइमर रोग से जुड़ा हुआ है।
हालांकि, चूहों पर किए गए एक हालिया अध्ययन में इसके विपरीत निष्कर्ष सामने आए हैं। इस अनुसंधान पत्र के लेखकों ने संकेत दिया है कि चूहों में, नींद के दौरान मस्तिष्क से हानिकारक सामग्री की निकासी वास्तव में कम होती है और पिछले निष्कर्षों की भी इस तरह से पुनर्व्याख्या की जा सकती है।
मस्तिष्क की सफाई प्रणाली
चूंकि मस्तिष्क एक सक्रिय ऊतक है जिसमें हर समय कई चयापचय और कोशिकीय प्रक्रियाएं होती रहती हैं। इसलिए यह बहुत सारा अपशिष्ट पैदा करता है। यह अपशिष्ट हमारे ‘ग्लाइम्फैटिक’ प्रणाली द्वारा निकाला जाता है।
सेरीहब्रोस्पाइनल द्रव ‘ग्लाइम्फैटिक’ प्रणाली का एक महत्वपूर्ण हिस्सा है। यह द्रव मस्तिष्क के चारों ओर ऐसा तरल पदार्थ है जो ‘कुशन’ के रूप में कार्य करता है, जो इसे क्षति से बचाता है और पोषण प्रदान करता है, ताकि मस्तिष्क सामान्य रूप से कार्य कर सके।
अपशिष्ट निकालने की प्रक्रिया के दौरान, हमारा सेरीब्रोस्पाइनल द्रव विषाक्त पदार्थों, मेटाबोलाइट्स और प्रोटीन से भरे पुराने और गंदे मस्तिष्क द्रव्य को मस्तिष्क के बाहर स्थानांतरित करने में मदद करता है, और नए द्रव के लिए स्थान बनाता है।
निकाला गया अपशिष्ट लसीका तंत्र (प्रतिरक्षा प्रणाली का एक भाग, जिसे अंग्रेजी में लिम्फैटिक सिस्टम कहते हैं) में पहुंच जाता है, जहां से अंततः यह आपके शरीर से बाहर निकल जाता है।
ग्लाइम्फैटिक सिस्टम की खोज पिछले दशक में ही हुई है। इसे सबसे पहले चूहों में देखा गया था, उनके मस्तिष्क में तरल पदार्थ की गति का अध्ययन करने के लिए डाई का इंजेक्शन लगाया गया था। एमआरआई स्कैन और ‘कंट्रास्ट डाई’ के उपयोग से मनुष्यों में ग्लाइम्फैटिक प्रणाली के अस्तित्व की पुष्टि हो चुकी है।
जानवरों पर किए गए अनुसंधानों के परिणामों के आधार पर, वैज्ञानिकों ने निष्कर्ष निकाला कि ‘ग्लाइम्फैटिक’ प्रणाली दिन की अपेक्षा रात में, सोते समय या एनेस्थीसिया के प्रभाव में अधिक सक्रिय होती है।
अन्य अध्ययनों से ज्ञात हुआ कि अपशिष्ट निष्कासन की यह गतिविधि विभिन्न स्थितियों के आधार पर भी भिन्न-भिन्न हो सकती है- जैसे कि नींद की स्थिति, बेहोश करने या नींद के लिए इस्तेमाल दवा के प्रकार तथा दिनभर व्यवहार में होने वाला बदलाव।
पुरानी व्याख्याओं को चुनौती देना
हाल के अध्ययन में नर चूहों का प्रयोग करके यह जांच की गई कि जब वे जागते, सोते या बेहोश होते हैं तो मस्तिष्क द्रव की गति किस प्रकार भिन्न होती है। अनुसंधानकर्ताओं ने ग्लिम्फैटिक प्रणाली के माध्यम से तरल पदार्थ के प्रवाह का पता लगाने के लिए जानवरों के मस्तिष्क में डाई का इंजेक्शन लगाया।
अनुसंधानकर्ताओं ने खासतौर पर यह परखा कि क्या डाई में वृद्धि किसी क्षेत्र से दूर तरल पदार्थ की गति में कमी को दर्शाती है, न कि उस क्षेत्र की ओर गति में वृद्धि को, जैसा कि पिछले अध्ययनों में संकेत किया गया था। पहली संभावना का अभिप्राय होगा कि ग्लाइम्फैटिक प्रणाली के माध्यम से कम निकासी और इसलिए कम अपशिष्ट का हटाया जाना।
जागने की तुलना में, सोने या बेहोशी की हालत में रहने के तीन और पांच घंटे बाद मस्तिष्क के क्षेत्रों में अधिक डाई पाई गई। इससे यह संकेत मिलता है कि जब चूहा सो रहा था या बेहोश था तो मस्तिष्क से कम रंग, और इसलिए कम तरल पदार्थ साफ हो रहा था।
निष्कर्ष दिलचस्प हैं, लेकिन अध्ययन की कई सीमाएं हैं। इसलिए, इसे इस बात की पूर्ण पुष्टि नहीं माना जा सकता कि मस्तिष्क दिन की तुलना में रात में उतना अपशिष्ट बाहर नहीं निकालता।
इस अध्ययन की सीमाएं
सबसे पहले, अध्ययन चूहों पर किया गया। जानवरों पर किए गए अध्ययनों के नतीजे हमेशा इंसानों पर लागू नहीं होते, इसलिए यह कहना मुश्किल है कि क्या हमारे लिए भी यही सच होगा।
अध्ययन में केवल नर चूहों को ही शामिल किया गया, जिन्हें सोने से पहले कुछ घंटों तक जगाए रखा गया था। इससे उनकी प्राकृतिक नींद-जागने की लय में गड़बड़ी हो सकती है, जिससे परिणाम आंशिक रूप से प्रभावित हो सकते हैं।
अध्ययनों से पता चला है कि बाधित या खराब नींद तनाव के स्तर में वृद्धि के साथ जुड़ी हुई है, जो बदले में ग्लिम्फैटिक प्रणाली से मस्तिष्क द्रव प्रवाह को कम करती है।
इसके विपरीत, पहले (2013) अध्ययन में दिखाया गया था कि नींद के दौरान मस्तिष्क से अधिक विषाक्त पदार्थ बाहर निकलते हैं, चूहों को उनके प्राकृतिक नींद के समय पर देखा गया था।


