लखनऊ, इलाहाबाद हाईकोर्ट की लखनऊ पीठ ने गिरफ्तारी और हिरासत से जुड़े एक महत्वपूर्ण मामले में स्पष्ट किया है कि किसी व्यक्ति को 24 घंटे के भीतर मजिस्ट्रेट के समक्ष पेश करने की संवैधानिक समय-सीमा केवल औपचारिक गिरफ्तारी ज्ञापन में दर्ज समय से निर्धारित नहीं होगी। यह अवधि उस समय से शुरू मानी जाएगी, जब संबंधित व्यक्ति को वास्तव में हिरासत में लिया गया और उसकी स्वतंत्रता तथा आवाजाही पर अधिकारियों का प्रभावी नियंत्रण स्थापित हो गया।
न्यायमूर्ति सुभाष विद्यार्थी ने सोने की बरामदगी से जुड़े मामले में यह टिप्पणी करते हुए सीमा शुल्क अधिकारियों द्वारा गिरफ्तार किए गए दो लोगों के रिमांड आदेश को रद्द कर दिया और उन्हें तत्काल रिहा करने का निर्देश दिया। अदालत ने संदीप जायसवाल और एक अन्य की याचिका पर 28 सितंबर को यह आदेश पारित किया।
याचिका के अनुसार, 22 अगस्त को कन्नौज के तिर्वा क्षेत्र में याचिकाकर्ताओं की कार एक पुलिस वाहन से टकरा गई थी। पुलिस को कार से कथित तौर पर करीब 10 किलोग्राम सोना बरामद हुआ और दोनों व्यक्तियों को सुबह करीब 5:45 बजे हिरासत में ले लिया गया। बाद में उन्हें सीमा शुल्क अधिकारियों को सौंप दिया गया।
याचिकाकर्ताओं का कहना था कि सीमा शुल्क विभाग ने औपचारिक गिरफ्तारी ज्ञापन 23 अगस्त को शाम 6:38 बजे तैयार किया, जबकि दोनों को 24 अगस्त को मजिस्ट्रेट के समक्ष पेश किया गया।
याचिकाकर्ताओं ने दलील दी कि उन्हें गिरफ्तारी ज्ञापन तैयार होने से काफी पहले ही प्रभावी रूप से हिरासत में लिया जा चुका था। इसलिए मजिस्ट्रेट के समक्ष पेश किए जाने तक संविधान के अनुच्छेद 22(2) में निर्धारित 24 घंटे की अवधि पार हो चुकी थी।
हाईकोर्ट ने इस दलील को स्वीकार करते हुए कहा कि संवैधानिक सुरक्षा को केवल गिरफ्तारी मेमो में दर्ज समय के आधार पर सीमित नहीं किया जा सकता। जैसे ही अधिकारियों का किसी व्यक्ति की आवाजाही और स्वतंत्रता पर प्रभावी नियंत्रण हो जाता है, वह अनुच्छेद 22(2) के उद्देश्य से हिरासत में माना जाएगा।
अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि यह संवैधानिक सुरक्षा केवल पुलिस की ओर से की गई गिरफ्तारी तक सीमित नहीं है, बल्कि सीमा शुल्क विभाग जैसे सक्षम अधिकारियों द्वारा किसी व्यक्ति को हिरासत में लिए जाने की स्थिति में भी लागू होती है।
मौलिक अधिकारों के उल्लंघन को देखते हुए हाईकोर्ट ने 24 अगस्त के रिमांड आदेश को रद्द कर दोनों याचिकाकर्ताओं को तत्काल रिहा करने का निर्देश दिया। साथ ही उन्हें रिहाई के 24 घंटे के भीतर संबंधित अधीनस्थ अदालत में पेश होकर कानून के अनुसार जमानत या अग्रिम जमानत की मांग करने का निर्देश दिया गया।