अयोध्या, गणतंत्र दिवस की पूर्व संध्या पर राष्ट्रीय सिंधी भाषा विकास परिषद, शिक्षा मंत्रालय, भारत सरकार द्वारा आयोजित “सिंधी विमर्श ” कार्यक्रम अयोध्या के संत गुल्लू राम दरबार में सम्पन्न हुआ।
विद्वानों, विद्यार्थियों व समाज के विचार शील उपस्थिति श्रोताओं को संबोधित करते वरिष्ठ पत्रकार,साहित्यकार एवं सिंधी अकादमी उत्तर प्रदेश सरकार के पूर्व सचिव ज्ञान प्रकाश टेकचंदानी “सरल” ने कहा कि समाज को अपनी अस्मिता अक्षुण्ण बनाए रखने के लिए अपनी भाषा, बोली, संस्कृति,खान पान, वेशभूषा,लोक संगीत,लोक कलाओं को जीवित रखना होगा।
नौजवानों को खोजी और सवाल पैदा करने वाला स्वभाव बनाना होगा,हम सिंधु घाटी की महान सभ्यता के वारिस हैं,पर इससे भी आगे जाकर उत्तर खोजना होगा कि विधर्मी आक्रांताओं के बर्बर हमलों के बीच हम अपनी संस्कृति को किस प्रकार बचाकर रख सके ?…
सिंधी सेंट्रल पंचायत के मुखिया पूर्व पार्षद बतौर मुख्य अतिथि ओम प्रकाश अंदानी ने ऐसे आयोजन की प्रशंसा करते कहा कि घरों में सभी मातृभाषा का ही उपयोग कर गर्व महसूस करें।

अध्यक्षता कर रहे सिंधी शिवालय के श्रीमहंत गणेश राय ऐसे आयोजन में आकर बहुत ही उत्साहित व आनंदित दिखे, उन्होंने कहा ऐसे कार्यक्रम में मैं हर सहयोग व प्रतिभाग हेतु सदैव सिंधी भाषा की रक्षा हेतु तन मन धन से तत्पर रहूंगा व समाज का पंडित पुरोहित के नाते यहां मुख्य वक्ता से प्राप्त ज्ञान व राष्ट्रीय सिंधी भाषा विकास परिषद के उद्देश्य को अवश्य ही आगे यजमानों को भी बताऊंगा।
स्वागताध्यक्ष मुखिया शिवालय परिवार व संरक्षक भक्त प्रह्लाद सेवा समिति राजकुमार मोटवानी ने कहा कि ऐसे कार्यक्रम से प्रेरित होकर हमारी संस्था इस बार बच्चों के बजाय बड़ों का समर कैम्प लगाकर उन्हें घर में नई पीढ़ी से अपनी मातृभाषा में बात करने का कार्यक्रम करेगी।
बीज वक्तव्य राष्ट्रीय सिंधी भाषा विकास परिषद के सदस्य प्रतिनिधि विश्व प्रकाश “रूपन” ने प्रस्तुत किया, धन्यवाद ज्ञापन संयोजक कपिल हासानी व संचालन सुमित माखेजा ने किया।
इस अवसर पर उपस्थित श्रोताओं की ओर से सिंधी विमर्श के बाद खूब सवाल भी मुख्य वक्ता ज्ञाप्रटे सरल से पूछे गये जिसका उन्होंने समुचित उत्तर भी दिया, विशेष बात यह रही कि उनके जैसे विद्वान की ओर से उठाया गया सवाल कि हम इतने लंबे विधर्मी आक्रमण में अपना सनातन धर्म भाषा, संस्कृति कैसे बचाकर आये और जीवित भी रहे , इसका उत्तर कोई दे न सका क्योंकि विभाजन की त्रासदी में छिन्न भिन्न समाज अपने वजूद को बचाने में लगा रहा, उन्होंने मांग किया कि केंद्र सरकार अवश्य ही इतिहास की तह में जाकर उत्तर खोजे और समाज के सामने लाये तभी एसे विमर्श सार्थक होंगे।


