प्रयागराज, इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने एक वरिष्ठ पुलिस अधिकारी को अनावश्यक रूप से न्यायिक नाराजगी का सामना कराने के लिए खेद जताया है। अदालत ने पूर्व की खामियों को दूर करने के लिए तथ्य छिपाकर दायर की गईं बंदी प्रत्यक्षीकरण की दो याचिकाएं खारिज कर दीं।
न्यायमूर्ति अतुल श्रीधरन और न्यायमूर्ति अचल सचदेव की पीठ ने सच्चाई छिपाने और असत्य को बढ़ावा देने के लिए याचिकाकर्ता ओमेन्द्र यादव पर 50 हजार रुपये का जुर्माना लगाया है। यह राशि प्रति याचिका 25 हजार रुपये है।
अदालत ने आदेश दिया कि जुर्माने की राशि एक महीने के भीतर सीधे बरेली के वरिष्ठ पुलिस अधीक्षक (एसएसपी) अनुराग आर्य को दी जाए। ऐसा नहीं करने पर इसे भू-राजस्व के बकाये के रूप में वसूल किया जाएगा।
याचिकाकर्ता ने बंदी प्रत्यक्षीकरण याचिका दायर कर आरोप लगाया था कि बरेली पुलिस ने उन्हें आठ मई से 13 मई, 2026 के बीच अवैध रूप से हिरासत में रखा था। इस अवधि का थाने का सीसीटीवी फुटेज मांगे जाने पर शासकीय अधिवक्ता ने दलील दी थी कि आंधी और बारिश के कारण हुए शॉर्ट सर्किट से डिजिटल वीडियो रिकॉर्डर (डीवीआर) नष्ट हो गया था।
इस पर सख्त रुख अपनाते हुए उच्च न्यायालय ने 26 मई को अनुराग आर्य को व्यक्तिगत हलफनामा दाखिल कर उच्चतम न्यायालय के परमवीर सिंह सैनी बनाम बलजीत सिंह मामले में दिए गए ऐतिहासिक फैसले के अनुसार खामियों की व्याख्या करने को कहा था।
पीठ ने 27 अक्टूबर को एसएसपी के हलफनामे की जांच की और पूछा कि 13 मई और 15 मई को आई आंधी से पहले की तारीखों की रिकॉर्डिंग कैसे मिट गई। हलफनामे को प्रथम दृष्टया भ्रामक मानते हुए पीठ ने अधिकारी को अदालत में पेश होने का निर्देश दिया था।
हालांकि, 30 अक्टूबर को सुनवाई के दौरान पीठ ने पाया कि यादव ने 26 मई को एक दूसरी, गुप्त बंदी प्रत्यक्षीकरण याचिका भी दायर की थी। ऐसा उन्होंने तब किया था, जब राज्य सरकार उनकी पहली याचिका पर जवाब दाखिल कर चुकी थी।
दूसरी याचिका में पहले से लंबित मामले का कोई उल्लेख नहीं था और उसे नयी याचिका के रूप में पेश किया गया था। इसमें कथित अवैध हिरासत की सटीक तारीख, स्थान और समयावधि से जुड़ी कमियों को दूर करने का प्रयास किया गया था।
इस रणनीतिक धोखाधड़ी पर पीठ ने कहा कि याचिकाकर्ता ने ईमानदारी और निष्पक्षता के साथ अदालत का रुख नहीं किया और इस कारण वह राहत पाने का अपना अधिकार खो चुका है।
अदालत ने यह भी कहा कि अपर शासकीय अधिवक्ता के कार्यालय को दोहरी याचिका दायर किए जाने की बात शुरुआत में ही उजागर कर देनी चाहिए थी।
अदालत ने 30 अक्टूबर के अपने फैसले में कहा, “इस अदालत को बरेली के वरिष्ठ पुलिस अधीक्षक को अपने क्रोध का निशाना बनाने की शर्मिंदगी नहीं झेलनी पड़ती। अदालत इस तरह की कठोर और अनुचित मौखिक टिप्पणियां करने के लिए सच्चे दिल से खेद प्रकट करती है।