इजराइल में संसदीय चुनाव मंगलवार को होंगे, जिनमें प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू सत्ता में बने रहने की कोशिश करेंगे। चुनाव में सात अक्टूबर 2023 को हमास के हमले, उसके बाद हुए युद्धों और सरकार की घरेलू एवं विदेश नीतियों से निपटने के तरीके पर बहस के बीच नेतन्याहू के नेतृत्व की परीक्षा होगी।
इस चुनाव को नेतन्याहू के नेतृत्व की परीक्षा के तौर पर देखा जा रहा है। पूर्व सैन्य प्रमुख गादी आइजेनकोट और पूर्व प्रधानमंत्री नफ्ताली बेनेट समेत विपक्षी नेता उनके दक्षिणपंथी गठबंधन को चुनौती देने की कोशिश कर रहे हैं।
चुनाव पूर्व सर्वेक्षणों के अनुसार, किसी भी खेमे को सरकार बनाने के लिए जरूरी संसदीय बहुमत मिलने का भरोसा नहीं है।
इजराइल का आकार पूर्वोत्तर भारत के मिजोरम राज्य के लगभग बराबर है। वहां आनुपातिक प्रतिनिधित्व की राष्ट्रव्यापी चुनाव प्रणाली लागू है। पूरे देश को एक ही निर्वाचन क्षेत्र माना जाता है, जहां से संसद यानी नेसेट के 120 सदस्य चुने जाते हैं।
मतदाता संसद के सदस्यों का सीधे चुनाव नहीं करते, बल्कि राजनीतिक दलों की बंद सूची के पक्ष में मतदान करते हैं। इस व्यवस्था के तहत कई राजनीतिक दल विधायिका में सीट हासिल करने के लिए चुनाव लड़ सकते हैं।
देश की संसद नेसेट में प्रवेश के लिए किसी दल को कम से कम 3.25 प्रतिशत मत हासिल करना जरूरी है। इस शर्त के कारण अक्सर चुनाव से पहले गठबंधन और दलों का विलय होता है।
नेसेट का कार्यकाल चार साल का होता है। हालांकि, यदि संसद स्वयं को भंग करने के पक्ष में मतदान करती है, निर्धारित अवधि में राज्य के बजट को मंजूरी देने में विफल रहती है या नई सरकार का गठन नहीं हो पाता, तो समय से पहले चुनाव कराए जा सकते हैं।
सबसे अधिक सीट जीतने वाले दल को अपने आप सरकार बनाने का मौका नहीं मिलता। चुनाव के बाद राष्ट्रपति राजनीतिक दलों के प्रतिनिधियों से विचार-विमर्श करते हैं और सरकार बनाने के लिए किसी सांसद को नामित करते हैं। सरकार बनाने के लिए उस उम्मीदवार को कम से कम 61 सांसदों का समर्थन हासिल करना होता है।
दक्षिणपंथी लिकुड पार्टी के नेता नेतन्याहू 1996 से तीन अलग-अलग अवधियों में लगभग 19 साल तक इजराइल के प्रधानमंत्री रह चुके हैं।
वह सात अक्टूबर के हमले और उसके बाद शुरू हुए कई सैन्य अभियानों से प्रभावित दौर के बाद एक बार फिर सत्ता में बने रहने की कोशिश कर रहे हैं। यह हमला तीन साल पहले हुआ था।
वर्ष 2023 में हमास के नेतृत्व में हुए हमले में इजराइल में लगभग 1,200 लोग मारे गए थे। इसके बाद गाजा में युद्ध शुरू हुआ, जो आगे चलकर इजराइल, ईरान और अन्य सशस्त्र समूहों के बीच व्यापक क्षेत्रीय संघर्ष में बदल गया।
हमले के बाद इजराइल ने गाजा पट्टी में बड़े पैमाने पर सैन्य अभियान शुरू किया। इसमें हवाई हमले, जमीनी कार्रवाई और ऐसी पाबंदियां शामिल थीं, जिनसे आम लोगों का जीवन बुरी तरह प्रभावित हुआ।
गाजा के स्वास्थ्य मंत्रालय के अनुसार, युद्ध शुरू होने के बाद से 74,000 से अधिक फलस्तीनियों के मारे जाने और 1,75,000 से अधिक लोगों के घायल होने की सूचना है।
सात अक्टूबर 2023 के हमले के लिए जवाबदेही तय करना और सुरक्षा सुनिश्चित करना चुनाव प्रचार के प्रमुख मुद्दे हैं।
नेतन्याहू पर धोखाधड़ी, विश्वासघात और रिश्वतखोरी के आरोप भी हैं, जिन्हें वह खारिज करते हैं। अंतरराष्ट्रीय आपराधिक अदालत (आईसीसी) ने 2024 में कथित युद्ध अपराधों और मानवता के खिलाफ अपराधों के मामले में उनके खिलाफ गिरफ्तारी वारंट जारी किया था।
इजराइल रक्षा बलों के पूर्व प्रमुख आइजेनकोट मध्यमार्गी याशर पार्टी का नेतृत्व करते हैं और नेतन्याहू के प्रमुख प्रतिद्वंद्वी के रूप में उभरे हैं। वह पहले नेतन्याहू के युद्ध मंत्रिमंडल में पर्यवेक्षक के तौर पर शामिल थे, लेकिन स्पष्ट युद्ध रणनीति के अभाव का आरोप लगाते हुए जून 2024 में इस्तीफा दे दिया था।
आइजेनकोट ने सुरक्षा के मुद्दे पर कड़ा रुख बरकरार रखते हुए सुशासन के मामले में खुद को नेतन्याहू के विकल्प के तौर पर पेश किया है। कुछ चुनाव पूर्व सर्वेक्षणों में उनकी पार्टी का प्रदर्शन अच्छा रहा है, हालांकि विपक्ष के सामने एक व्यावहारिक गठबंधन बनाने की चुनौती है।
पूर्व प्रधानमंत्री बेनेट ‘बयाचाड’ चुनावी गठबंधन का नेतृत्व कर रहे हैं, जिसमें पूर्व प्रधानमंत्री यायर लैपिड की येश अतिद पार्टी भी शामिल है। दक्षिणपंथी नेता बेनेट फलस्तीन की स्वतंत्रता का विरोध करते हैं और कब्जे वाले पश्चिमी तट में इजराइली बस्तियों का समर्थन करते हैं। हालांकि, उन्होंने सुरक्षा और शासन के मुद्दों पर नेतन्याहू की आलोचना भी की है।
बेनेट ने 2021 में लैपिड के साथ सत्ता-साझेदारी के तहत कुछ समय के लिए प्रधानमंत्री का पद संभाला था। उनका गठबंधन नेतन्याहू सरकार को बदलने की कोशिश कर रहे विपक्षी दलों में शामिल है।
अन्य प्रमुख राजनीतिक नेताओं में वामपंथी रुझान वाले डेमोक्रेट यायर गोलान, एविगडोर लिबरमैन की यिसराइल बेतेनु पार्टी और अरब नेताओं के नेतृत्व वाले रैम और ज्वाइंट लिस्ट जैसे दल शामिल हैं।
नेतन्याहू के खेमे में इतामार बेन-ग्विर और बेजालेल स्मोट्रिच के नेतृत्व वाले धुर दक्षिणपंथी दलों के साथ-साथ अति-रूढ़िवादी यहूदी दल प्रमुख गठबंधन सहयोगी हैं।
चुनाव प्रचार में गाजा युद्ध के भविष्य, अमेरिका के साथ संबंधों, ईरान से खतरे और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर इजराइल की स्थिति जैसे मुद्दे प्रमुख हैं।
नेतन्याहू के नेतृत्व और घरेलू शासन के मुद्दों पर प्रमुख उम्मीदवारों के बीच मतभेद हैं, लेकिन सुरक्षा संबंधी मामलों पर उनमें से अधिकतर के रुख मोटे तौर पर समान हैं। इनमें निकट भविष्य में फलस्तीन देश की स्थापना का विरोध भी शामिल है।
चुनाव ऐसे समय हो रहे हैं, जब अति-रूढ़िवादी यहूदी पुरुषों को सैन्य सेवा से छूट देने, सरकार में धार्मिक दलों की भूमिका और लोकतांत्रिक संस्थाओं एवं न्यायपालिका की स्वतंत्रता को लेकर चिंताएं बनी हुई हैं।
इजराइल में अधिकांश यहूदी पुरुषों के लिए सैन्य सेवा अनिवार्य है। हालांकि, धार्मिक मदरसों में पढ़ने वाले अति-रूढ़िवादी यहूदी पुरुषों को ऐतिहासिक रूप से व्यापक छूट या सेवा स्थगित करने की सुविधा मिलती रही है।
युद्धों के दौरान यह मुद्दा और गंभीर हो गया है, क्योंकि सेना को अधिक सैनिकों की जरूरत है और रिजर्व सैनिकों को लंबे समय तक सेवा देनी पड़ रही है।
चुनाव पूर्व सर्वेक्षणों के अनुसार, न तो नेतन्याहू के खेमे और न ही विपक्ष के पास बहुमत के लिए जरूरी 61 सीट हासिल करने की संभावना है।
ऐसे में चुनाव का नतीजा इस बात पर निर्भर कर सकता है कि छोटे दलों में से कौन-कौन 3.25 प्रतिशत की चुनावी सीमा पार कर पाता है और मतदान के बाद गठबंधन बनाने के लिए किस तरह की बातचीत होती है।