लखनऊ, इलाहाबाद उच्च न्यायालय की लखनऊ पीठ ने कहा है कि बिना किसी छूट या रियायत के अनारक्षित वर्ग के लिए निर्धारित न्यूनतम कट-ऑफ से अधिक अंक हासिल करने वाले आरक्षित वर्ग के मेधावी अभ्यर्थी को भर्ती प्रक्रिया के स्क्रीनिंग चरण में ही अनारक्षित श्रेणी का अभ्यर्थी माना जाना चाहिए।
अदालत ने कहा कि स्क्रीनिंग परीक्षा केवल प्रारंभिक छंटनी की प्रक्रिया नहीं है, बल्कि इसमें प्राप्त अंकों का अंतिम चयन की मेरिट पर महत्वपूर्ण प्रभाव पड़ता है।
न्यायमूर्ति राजन रॉय और न्यायमूर्ति मंजीव शुक्ला की खंडपीठ ने मंगलवार को भावना यादव और अन्य की ओर से दाखिल विशेष अपील स्वीकार करते हुए यह आदेश दिया। अदालत ने स्पष्ट किया कि संबंधित भर्ती में स्क्रीनिंग परीक्षा के अंकों का अंतिम मेरिट सूची में 75 प्रतिशत और साक्षात्कार के अंकों का 25 प्रतिशत योगदान है।
ऐसे में स्क्रीनिंग परीक्षा अंतिम चयन प्रक्रिया का महत्वपूर्ण हिस्सा है और आरक्षित वर्ग के मेधावी अभ्यर्थियों को अनारक्षित श्रेणी में समायोजित करने का लाभ केवल अंतिम चरण तक सीमित नहीं किया जा सकता।
मामला स्वास्थ्य शिक्षा अधिकारी के पद पर भर्ती से जुड़ा है। उत्तर प्रदेश लोक सेवा आयोग ने 22 दिसंबर 2025 को जारी भर्ती विज्ञापन में प्रावधान किया था कि आरक्षित वर्ग के अभ्यर्थियों को अनारक्षित श्रेणी में केवल अंतिम चयन के समय समायोजित किया जाएगा, यदि उन्होंने स्क्रीनिंग परीक्षा में किसी प्रकार की छूट या रियायत का लाभ नहीं लिया हो। याचिकाकर्ताओं ने इस शर्त के साथ आयोग के 9 जनवरी 2020 के कार्यालय ज्ञापन को भी चुनौती दी थी।
पीठ ने कहा कि उत्तर प्रदेश लोक सेवा (अनुसूचित जातियों, अनुसूचित जन-जातियों और अन्य पिछड़े वर्गों के लिए आरक्षण) अधिनियम, 1994 की धारा 3(6) में ऐसी कोई पाबंदी नहीं है कि आरक्षित वर्ग के मेरिटोरियस अभ्यर्थी का अनारक्षित वर्ग में समायोजन केवल अंतिम चयन के चरण में ही किया जाए। अदालत ने भर्ती विज्ञापन की संबंधित शर्त को रद्द कर दिया और कहा कि 9 जनवरी 2020 का कार्यालय ज्ञापन इस भर्ती पर लागू नहीं होगा।
उच्च न्यायालय ने आयोग को तीन महीने के भीतर उक्त कार्यालय ज्ञापन की प्रासंगिकता की समीक्षा करने का निर्देश दिया है। साथ ही राज्य सरकार से इस संबंध में स्पष्ट नीति तैयार करने को कहा गया है।