लखनऊ, प्रदेश के निजी अस्पतालों में इलाज के नाम पर मरीजों से वसूली जाने वाली मोटी रकम अब हाई कोर्ट की रडार पर आ गई है। इलाहाबाद हाई कोर्ट की लखनऊ खंडपीठ ने इस स्थिति को बीमारी की मजबूरी का फायदा उठाकर आम जनता को लूटने जैसा करार दिया है।
कोर्ट ने सख्त लहजे में कहा कि इस तरह की व्यवस्था किसी भी हाल में स्वीकार्य नहीं की जा सकती। ‘वी द पीपल’ संस्था द्वारा दाखिल जनहित याचिका पर सुनवाई करते हुए न्यायमूर्ति राजन राय और न्यायमूर्ति मंजिव शुक्ल की पीठ ने केंद्र और राज्य सरकार को निर्देश दिए हैं कि वे निजी अस्पतालों के शुल्क नियमन (फीस कंट्रोल) के लिए मौजूदा कानूनों की समीक्षा करें या नया सख्त कानून बनाने पर विचार करें।
सुनवाई के दौरान अदालत ने राज्य भर के निजी अस्पतालों की फीस में बड़े पैमाने पर असमानता पर गहरा ऐतराज जताया। कोर्ट ने क्लीनिकल एस्टेब्लिशमेंट्स एक्ट, 2010 के तहत अब तक पर्याप्त नियमन तंत्र (Regulatory Mechanism) न बन पाने पर हैरानी व्यक्त की।
इसके साथ ही क्लीनिकल एस्टेब्लिशमेंट्स रूल्स, 2012 के नियम नौ का हवाला देते हुए कोर्ट ने स्पष्ट किया कि सभी अस्पतालों और क्लीनिकों के लिए अपनी सेवाओं और उनकी दरों का रेट बोर्ड प्रदर्शित करना अनिवार्य है।
हाई कोर्ट ने इस मामले में कड़ा रुख अपनाते हुए सरकार से उन निजी अस्पतालों का जिलेवार ब्योरा मांगा है, जिन्होंने सरकारी सहायता या रियायती दरों पर जमीन हासिल की है।
वहीं, लखनऊ जिला पंजीकरण प्राधिकरण से भी पिछले पांच वर्षों के दौरान निजी अस्पतालों के खिलाफ की गई जांच और दंडात्मक कार्रवाई की वर्षवार रिपोर्ट तलब की गई है। इसके अलावा नेशनल काउंसिल ऑफ क्लीनिकल एस्टेब्लिशमेंट्स के गठन और मेडिकल रिकॉर्ड्स के पारदर्शी रख-रखाव पर भी जवाब मांगा गया है।
मामले की अगली सुनवाई 21 सितंबर को तय की गई है। माना जा रहा है कि कोर्ट के इस कड़े रुख से निजी अस्पतालों की मनमानी पर लगाम लगेगी और आम जनता को पारदर्शी व किफायती इलाज मिल सकेगा।










