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बच्चों को जेब खर्च देने का नफा-नुकसान!; रोजमर्रा के काम के बदले भुगतान?

ब्यूरो पब्लिकन्यूज़360 by ब्यूरो पब्लिकन्यूज़360
August 3, 2026
in Featured
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जब मैं छोटा था, तब मेरे साथ के कई बच्चे जेब खर्च निकालने के लिए पड़ोसियों के शिशुओं की देखभाल करने, उनके बगीचे में घास काटने, कुत्तों को टहलाने या गाड़ियां धोने जैसे काम किया करते थे। स्थानीय अखबार या प्रचार सामग्री बांटने जैसी अंशकालिक नौकरियां भी काफी लोकप्रिय थीं।

वहीं, कुछ बच्चों को जेब खर्च के रूप में घरवालों से हर हफ्ते कुछ रकम मिलती थी, जिसमें साल दर साल इजाफा होता जाता था। यह रकम कितनी होगी और इसमें हर साल कितनी बढ़ोतरी होगी, यह मुख्य रूप से परिवार की आर्थिक स्थिति पर निर्भर करता था।

मुझे और मेरे दोस्तों को अपने-अपने माता-पिता से जेब खर्च तब मिलता था, जब हम उनके दिए काम पूरे करते थे। हालांकि, आमतौर पर हम काम करें या न करें, हमें जेब खर्च मिल ही जाता था।

मगर आज बच्चों के लिए भुगतान ऐप, खर्च पर नजर रखने वाले साधनों और ऐसी अन्य सुविधाओं की उपलब्धता के चलते तस्वीर काफी बदल गई है।

इसके बावजूद बच्चों को जेब खर्च दिए जाने के मामले में आज भी कुछ ऐसे पुराने सवाल शामिल हैं, जिनमें मुझ जैसे व्यवहारिक अर्थशास्त्रियों को दिलचस्पी है। क्या बच्चों को पैसे कमाने के वास्ते “मेहनत” करने के लिए प्रेरित किया जाना चाहिए, जैसे कि पड़ोसियों के घर का कोई काम? या फिर घर के कामों में मदद के बदले भी उन्हें पैसे दिए जाने चाहिए?

अगर हम बच्चों को उनके घरेलू कामों के बदले पैसे देते हैं, तो क्या इससे उनमें बिना किसी स्वार्थ के मदद करने के बजाय पैसे को ज्यादा अहमियत देने की आदत विकसित होने का खतरा है?

——मदद की नीयत से काम करना——

यह धारणा नयी नहीं है कि किसी काम के लिए पैसे देने से व्यक्ति में उस काम को करने की अंदरूनी (स्वतंत्र और स्वाभाविक) प्रेरणा कम या खत्म हो सकती है।

व्यवहारिक अर्थशास्त्री कई दशकों से इस धारणा पर शोध कर रहे हैं। उदाहरण के तौर पर, उन्होंने यह पता लगाने की कोशिश की है कि क्या लोगों को रक्तदान के बदले पैसे देने से उनके ऐसा करने की संभावना कम हो जाती है।

इस बात के मिले-जुले प्रमाण हैं कि क्या पैसे देने से व्यक्ति की अंदरूनी प्रेरणा कम हो जाती है। यह भी अभी पूरी तरह स्पष्ट नहीं है कि कुछ मामलों में ऐसा क्यों होता है और कुछ में नहीं। हालांकि, नये शोध से संकेत मिलता है कि पैसे की जगह खास सुविधाएं या “सम्मान” आधारित पुरस्कार देने से लोगों की स्वाभाविक प्रेरणा बनी रह सकती है।

बच्चों और घरेलू कामों के मामले में एक अच्छे अर्थशास्त्री की तरह हमें उन प्रोत्साहनों और संदेशों पर विचार करना चाहिए, जो माता-पिता की ओर से कुछ सामान्य परिस्थितियों में बच्चों को काम के बदले पैसों का भुगतान करने से जाता है।

——रोजमर्रा के काम के बदले भुगतान——

सबसे पहले, मान लीजिए कि माता-पिता बच्चे को रोजमर्रा के कामों, जैसे कि मेज साफ करने या कुत्ते को टहलाने के लिए पैसे देते हैं। ये काम बच्चे के लिए न तो ज्यादा मुश्किल होते हैं, न ही उन्हें इन्हें करने में कोई आपत्ति होती है।

ऐसे मामले में माता-पिता अनजाने में बच्चों को यह संदेश दे रहे होते हैं कि परिवार के दूसरे सदस्य जो काम बिना किसी अतिरिक्त पैसे या प्रशंसा की उम्मीद के करते हैं, उसी काम के लिए उन्हें भुगतान किया जा रहा है।

इससे बच्चों को यह लग सकता है कि वे परिवार के बाकी सदस्यों से अलग हैं, क्योंकि उन पर ऐसी कोई जिम्मेदारी नहीं है, जिसकी समाज में उम्मीद तो की जाती है, लेकिन जिसके लिए कोई भौतिक इनाम नहीं मिलता।

इससे बच्चे के मन में यह भावना कमजोर हो सकती है कि “हम सभी रोजाना अपने परिवार के लिए कुछ न कुछ योगदान देते हैं।” साथ ही उन्हें यह संकेत मिल सकता है कि केवल तभी योगदान दें, जब उसके बदले पैसों का भुगतान किया जाए।

——खास काम के बदले पैसे देना——

दूसरा, एक ऐसी स्थिति पर विचार करें, जिसमें बच्चे को पैसे के बदले कोई विशेष काम करने का प्रस्ताव दिया जाता है, जैसे कार धोना या घर की पुताई में माता-पिता की मदद करना।

ऐसे मामले में काम कुछ हद तक चुनौतीपूर्ण होता है और माता-पिता चाहें तो इसे परिवार से बाहर के किसी व्यक्ति से भी करा सकते हैं।

इस स्थिति में बच्चे के मन में संदेश जाता है कि यह उसके लिए कोई नया हुनर सीखने, पैसे बचाने में माता-पिता की मदद करने और बदले में इनाम पाने का एक खास मौका है।

——नियमित जेब खर्च देना कितना ठीक——

अगर माता-पिता अपने बच्चे को छोटी-छोटी इच्छाएं पूरी करने के लिए नियमित जेब खर्च दे सकते हैं, जैसे दोस्तों के साथ महीने में एक बार फिल्म देखने जाना, तो इसे घरेलू कामों से जोड़ने की जरूरत नहीं है। इसके बजाय, इसे बच्चे को पैसे का सही प्रबंधन सिखाने के एक तरीके के तौर पर देखा जा सकता है।

बिना पैसे का प्रबंधन सीखे 12 साल का एक ऐसा बच्चा, जिसकी कई भौतिक इच्छाएं हैं, आगे चलकर 16 साल का ऐसा किशोर बन सकता है, जिसे न तो बचत करना आता है और न ही अपने खर्चों पर नियंत्रण रखना।

बच्चे को हर हफ्ते जेब खर्च देने का मकसद उसे घरेलू कामों के एवज में भुगतान करना नहीं, बल्कि आर्थिक रूप से समझदार और जिम्मेदार वयस्क बनने में उसकी मदद करना है।

अगर आप अपने बच्चे को हर हफ्ते जेब खर्च देने में समक्ष नहीं हैं, तो आस-पड़ोस में उसके लिए करने लायक कोई छोटा-मोटा काम ढूंढना एक अच्छा विकल्प हो सकता है।

——जिंदगी के सबक सिखाने का मौका——

अगर आपका बच्चा परिवार के बाकी सदस्यों की तरह रोजमर्रा के घरेलू कामों में योगदान देता है, तो यह उसे एक ऐसा वयस्क बनने की दिशा में तैयार कर सकता है, जिसमें दूसरों की मदद करने की स्वाभाविक प्रेरणा हो।

ऐसे कामों के लिए पैसे देना जरूरी नहीं होना चाहिए, क्योंकि इसके कुछ नकारात्मक प्रभाव भी हो सकते हैं। इसके बजाय, बच्चों को उन विशेष कामों के लिए पैसे देने पर विचार करें, जो उन्हें कोई नया हुनर सीखने के लिए प्रेरित करें। इससे उन सामाजिक मूल्यों और दायित्वों के कमजोर होने का खतरा भी कम रहेगा, जिन्हें आप अपने बच्चे में विकसित करना चाहते हैं।

ज्यादा जेब खर्च पाने के लिए बच्चों को पड़ोसियों की मदद करने के लिए प्रोत्साहित करें। वहीं, अगर आपकी माली हालत आपको बच्चे को जेब खर्च देने की अनुमति देती है, तो उन्हें पैसों का प्रबंधन सिखाने के लिए हर हफ्ते सीमित राशि प्रदान करें।

अगर माता-पिता काम, पैसे और समुदाय के प्रति समझदारी भरा नजरिया अपनाएं, तो वे अपने बच्चों की ऐसे जिम्मेदार वयस्क बनने में मदद कर सकते हैं, जो समाज के प्रति संवेदनशील होने के साथ-साथ आर्थिक रूप से भी समझदार हों।

(द कन्वरसेशन)

Tags: बच्चों को जेब खर्च देने
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