अयोध्या, रामनगरी के सुनियोजित विकास का दावा करने वाला अयोध्या विकास प्राधिकरण अब खुद कठघरे में खड़ा दिखाई दे रहा है। ग्राम सलारपुर स्थित अवध वाटर पार्क पर हुई अचानक तालाबंदी और फिर कुछ ही दिनों बाद उसकी रहस्यमयी बहाली ने प्राधिकरण की कार्यशैली पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। स्थानीय लोगों में चर्चा है कि यहां नियम-कानून नहीं, बल्कि रसूख और ‘मैनेजमेंट’ का खेल चलता है।
पहले अवैध घोषित, फिर अचानक वैध?
बताया जाता है कि 28 अप्रैल को प्राधिकरण की टीम ने मौके पर पहुंचकर अवध वाटर पार्क को सील कर दिया था। अधिकारियों ने दावा किया कि कार्रवाई उत्तर प्रदेश नगर नियोजन एवं विकास अधिनियम 1973 के तहत की गई है। आरोप था कि परिसर के पास न वैध नक्शा था और न ही सुरक्षा व पर्यावरण संबंधी जरूरी एनओसी।
लेकिन हैरानी की बात यह रही कि कुछ ही दिनों बाद वही परिसर दोबारा खुल गया। बिना किसी सार्वजनिक स्पष्टीकरण के। अब बड़ा सवाल यह उठ रहा है कि जो परिसर अप्रैल में अवैध और असुरक्षित बताया गया, वह मई आते-आते आखिर किस आधार पर वैध घोषित कर दिया गया?
महायोजना की जमीन पर निजी कारोबार?
मामले का सबसे गंभीर पहलू भू-उपयोग को लेकर सामने आ रहा है। सूत्रों के अनुसार जिस भूमि पर करोड़ों रुपये का वाटर पार्क संचालित हो रहा है, वह अयोध्या महायोजना में “सामाजिक एवं सार्वजनिक उपयोग” के लिए आरक्षित बताई गई है।
नियमों के मुताबिक ऐसी जमीन पर निजी व्यावसायिक निर्माण की अनुमति तब तक नहीं दी जा सकती जब तक शासन स्तर पर भू-उपयोग परिवर्तन न किया जाए। ऐसे में सवाल उठ रहा है कि क्या दोबारा संचालन की अनुमति देने से पहले शासन या कैबिनेट से मंजूरी ली गई थी? अगर नहीं, तो आखिर किस स्तर पर नियमों को नजरअंदाज किया गया?
निर्माण चलता रहा, विभाग सोता रहा?
स्थानीय लोगों का कहना है कि यह कोई छोटा-मोटा निर्माण नहीं था। महीनों तक परिसर में निर्माण कार्य चलता रहा। भारी मशीनें लगीं, ढांचे बने और तालाब तैयार हुए, लेकिन प्राधिकरण के अभियंताओं को कथित तौर पर कुछ दिखाई नहीं दिया।
अब सवाल उठ रहा है कि जब निर्माण हो रहा था तब विभागीय अधिकारी क्या कर रहे थे? क्या यह महज लापरवाही थी या फिर मिलीभगत? जनशिकायतें बढ़ने के बाद ही कार्रवाई होना भी कई सवाल खड़े कर रहा है।
सुरक्षा इंतजामों पर भी सवाल
गर्मी की छुट्टियों के चलते वाटर पार्क में रोज बड़ी संख्या में बच्चे और परिवार पहुंच रहे हैं। लेकिन सूत्रों का दावा है कि परिसर को पूरी तरह खोलने से पहले न तो अग्निशमन विभाग की ठोस एनओसी ली गई और न ही संरचनात्मक सुरक्षा की स्वतंत्र जांच कराई गई।
ऐसे में यदि भविष्य में कोई हादसा होता है तो जिम्मेदारी किसकी होगी? क्या प्रशासन केवल कागजी औपचारिकताओं के सहारे अपनी जवाबदेही से बच जाएगा?
चुनिंदा कार्रवाई पर उठे सवाल
स्थानीय लोगों का आरोप है कि इलाके में कई अन्य व्यावसायिक निर्माण भी बिना मानचित्र स्वीकृति के संचालित हो रहे हैं, लेकिन कार्रवाई केवल चुनिंदा परिसरों पर ही होती है। इससे प्राधिकरण की निष्पक्षता पर भी सवाल उठ रहे हैं।
अब सबकी नजर उस फाइल पर टिकी है जिसमें तालाबंदी और बहाली से जुड़े आदेश दर्ज हैं। माना जा रहा है कि यदि यह पत्रावली सार्वजनिक हुई तो पूरे मामले की परतें खुल सकती हैं।
फिलहाल अयोध्या विकास प्राधिकरण की चुप्पी कई बड़े सवाल छोड़ रही है, जिनका जवाब जनता जानना चाहती है।

