दिल्ली स्थित अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान (एम्स) ने शल्य चिकित्सा की एक नयी तकनीक विकसित की है, जिससे जटिल रीढ़ की हड्डी की विकृतियों से पीड़ित मरीजों के सफल उपचार की उम्मीद जगी है क्योंकि पहले रीढ़ संबंधी ऑपरेशन को अधिक जोखिम वाला माना जाता था।
एम्स ने एक बयान में कहा कि अस्पताल के हड्डी रोग विभाग में कार्यरत डॉ. भावुक गर्ग और उनकी टीम द्वारा पिछले सात वर्षों की मेहनत से विकसित की गई संशोधित सर्जिकल पद्धति ने रीढ़ की हड्डी की विकृति से पीड़ित रोगियों के लिए नई उम्मीद जगाई है, जिनके पास पहले उपचार के सीमित विकल्प थे और सुधारात्मक सर्जरी के दौरान जटिलताओं के उच्च जोखिम का सामना करना पड़ता था।
यह तकनीक ‘पोस्टीरियर वर्टेब्रल कॉलम रिसेक्शन’ (पीवीसीआर) का एक परिष्कृत संस्करण है, जिसे विश्व स्तर पर रीढ़ की हड्डी की विकृति को ठीक करने की सबसे जटिल प्रक्रियाओं में से एक माना जाता है। दिल्ली स्थित एम्स द्वारा किए गए इस संशोधन का विस्तृत विवरण 2020 में एक अंतरराष्ट्रीय वैज्ञानिक पत्रिका में प्रकाशित हुआ था।
चिकित्सकों के मुताबिक संशोधित विधि सर्जरी के बाद के चरणों तक रीढ़ की हड्डी के कुछ पश्च भाग को संरक्षित रखती है, जिससे सुधार के दौरान रीढ़ की हड्डी की स्थिरता में सुधार होता है और पारंपरिक प्रक्रियाओं से जुड़ी तंत्रिका संबंधी एवं अन्य जीवन-घातक जटिलताओं को संभावित रूप से कम किया जा सकता है।
चिकित्सकों ने बताया कि गंभीर विकृतियों से पीड़ित मरीजों में अक्सर रीढ़ की हड्डी में टेढ़ापन, लगातार दर्द, सांस लेने में कठिनाई, सीधे खड़े होने में असमर्थता और गंभीर मनोवैज्ञानिक और सामाजिक परेशानी जैसे लक्षण दिखाई देते हैं।
इस संबंध में एक वरिष्ठ चिकित्सक ने कहा, ‘‘पहले इन सर्जरी से लोग डरते थे क्योंकि इनमें गंभीर तंत्रिका संबंधी या जानलेवा जटिलताओं का खतरा रहता था। आज बेहतर तकनीक और अनुभव के साथ, परिणाम उल्लेखनीय रूप से बेहतर हुए हैं।




