मकर संक्रांति 2026 को लेकर इस बार कन्फ्यूजन की स्थिति बनी है क्योंकि यह पर्व एकादशी तिथि के साथ पड़ रहा है. वैदिक पंचांग के अनुसार षटतिला एकादशी 13 जनवरी दोपहर से शुरू होकर 14 जनवरी शाम तक रहेगी, जबकि सूर्य का मकर राशि में प्रवेश 14 जनवरी दोपहर बाद होगा।
मकर संक्रांति के दिन एकादशी भी पड़ जाने से खिचड़ी खाने को लेकर कन्फ्यूजन की स्थिति बनी हुई है।
संक्रांति के मौके पर देशभर में अलग-अलग जगहों पर लगभग एक सी परंपरा है. लोग स्नान करते हैं, दान करते हैं और फिर खिचड़ी खाते हैं। बिहार में इस दिन दही-चूड़ा खाया जाता है। इन सारी परंपराओं और मान्यताओं के साथ एक मान्यता ये भी है एकादशी के दिन चावल नहीं खाया जाता है।
सनातन परंपरा में एकादशी तिथि को चावल खाने की मनाही है. इसलिए कनफ्यूजन इस बात पर है कि मकर संक्रांति के दिन खिचड़ी खाई जाए या नहीं! इस कनफ्यूजन को दूर करने के लिए मकर संक्रांति और षटतिला एकादशी दोनों के समय पर गौर करना चाहिए।
कब से शुरू हो रही है एकादशी तिथि
वैदिक पंचांग के अनुसार, षटतिला एकादशी तिथि की शुरुआत 13 जनवरी 2026 को दोपहर 03 बजकर 17 मिनट से हो रही है. इसकी समाप्ति 14 जनवरी 2026 को शाम 05 बजकर 52 मिनट पर होगी. सनातन परंपरा में उदयातिथि को मान्यता दी जाती है, इसलिए षटतिला एकादशी का व्रत 14 जनवरी 2026, बुधवार को रखा जाएगा।
अब इसी तरह मकर संक्रांति की तिथि पर ध्यान दें तो 14 जनवरी को मकर राशि में सूर्य का गोचर दोपहर के बाद हो रहा है. पंचांग के मुताबिक, 14 जनवरी 2026 को दोपहर 3 बजकर 7 मिनट पर सूर्य मकर राशि में प्रवेश करेंगे। सूर्य का मकर राशि में प्रवेश करना ही मकर संक्रांति कहलाता है। सूर्य 14 जनवरी को मकर संक्रांति में प्रवेश कर लेंगे लेकिन जिस समय यह घटना होगी, उसमें दिन का अधिकतम समय निकल चुका होगा।
उदया तिथि में मनाएं मकर संक्रांति
गोरखपुर में गोरखनाथ मंदिर से जुड़े आचार्य पंडित सीबी त्रिपाठी कहते हैं कि मकर संक्रांति के पर्व में उदया तिथि की मान्यता रखनी चाहिए। यह इसलिए भी जरूरी है कि क्योंकि यह त्योहार ही सूर्य से जुड़ा हुआ है। उदया तिथि सूर्योदय के साथ लगने वाली तिथि को मान्यता देती है। इसलिए मकर संक्रांति 15 जनवरी को ही मनानी चाहिए। इससे मकर संक्रांति में एकादशी तिथि की छाया भी नहीं रहेगी और स्नान, दान के साथ खिचड़ी खाने की परंपरा का पालन भी हो जाएगा।
बीते कुछ वर्षों पर ध्यान दें तो मकर संक्रांति 15 जनवरी को ही पड़ रही है। साल 2024 में मकर राशि में सूर्य का प्रवेश सुबह 9 बजे हुआ था। साल 2023 में भी मकर संक्रांति 15 जनवरी को ही मनाई गई थी। इसलिए 14 या 15 जनवरी को लेकर कन्फ्यूजन इसीलिए हो गया है क्योंकि इस बार सूर्य का राशि परिवर्तन 14 तारीख में दोपहर बाद हो रहा है, लेकिन उदया तिथि की मान्यता को लें तो संक्रांति को 15 जनवरी को ही मनाया जाना चाहिए।
सूर्य की राशि परिवर्तन पर आधारित त्योहार है मकर संक्रांति
मकर संक्रांति का त्योहार न तो तारीख पर आधारित है और न ही चंद्रमा की तिथियों पर, यह त्योहार सूर्य की तिथि और इसकी राशि पर प्रवेश पर आधारित है. अंग्रेजी कैलेंडर सूर्य पंचांग से थोड़ा बहुत मेल खाता है, इसिलिए ऐसा लगता है कि 14 या 15 जनवरी ही मकर संक्रांति की तय तारीख है, जबकि ऐसा नहीं है।
सूर्य राशि परिवर्तन
ज्योतिषी के अनुसार, 14 जनवरी को दोपहर 03 बजकर 43 मिनट पर सूर्य देव धनु राशि से निकलकर मकर राशि में प्रवेश करेंगे। सूर्य देव के मकर राशि में प्रवेश के दिन मकर संक्रांति मनाई जाती है।
आप पुराने समय के कैलेंडर को देखिए तो पहले मकर संक्रांति 10 या 12 जनवरी को भी मनाई जाती थी। असल में ग्रहों की चाल के कारण हर 70 से 75 वर्षों में मकर संक्रांति की तिथियों में बदलाव आता है। पहले यह 13-14 जनवरी को मनाई जाती थी, लेकिन अब यह 14-15 जनवरी को मनाई जाने लगी है। इस दिन पवित्र नदियों में स्नान, खिचड़ी का सेवन और तिल-गुड़ के दान का खास महत्व है।
ज्योतिष कहता है कि सूर्य देव जब धनु राशि से मकर राशि में जाते हैं तो इस दिन मकर संक्रांति का त्योहार मनाया जाता है। सूर्य का ये राशि परिवर्तन पूरे भारत में मौसम बदलने की सूचना देता है और इसके बाद से धीरे-धीरे दिन गर्म होने लगते हैं। धूप कुनकुनी होने लगती है और इसी दिन आहार, व्यवहार और विचार में बदलाव आता है, यानी तीनों में ही मेल-जोल दिखाई देता है।




