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POCSO एक्ट के तहत 20 साल की सजा पाए अभियुक्त को हाईकोर्ट से राहत, अधिवक्ता अभिनव श्रीवास्तव की बहस; सजा निलंबित कर जमानत मंजूर

ब्यूरो पब्लिकन्यूज़360 by ब्यूरो पब्लिकन्यूज़360
January 11, 2026
in उत्तर प्रदेश, देश
0
अदालत की अवमानना मामले में बिजनौर जिलाधिकारी के खिलाफ जमानती वारंट जारी

लखनऊ, इलाहाबाद हाईकोर्ट की लखनऊ पीठ ने POCSO एक्ट से जुड़े एक गंभीर आपराधिक मामले में अहम आदेश पारित करते हुए दोषसिद्ध अभियुक्त शिव सागर उपाध्याय को बड़ी राहत दी है।

न्यायालय ने अभियुक्त की अपील लंबित रहने तक उसकी सजा को निलंबित करते हुए जमानत पर रिहा करने का आदेश दिया है। अभियुक्त को ट्रायल कोर्ट द्वारा IPC की धारा 376 एवं POCSO एक्ट की धारा 5/6 के अंतर्गत 20 वर्ष की कठोर कारावास की सजा सुनाई गई थी। इसके अतिरिक्त IPC की धारा 363 के तहत 2 वर्ष तथा धारा 366 के तहत 4 वर्ष के कारावास की सजा भी दी गई थी, जो सभी सजाएं साथ-साथ चलने के आदेश के साथ दी गई थीं।

यह आदेश माननीय न्यायमूर्ति राम मनोहर नारायण मिश्र द्वारा पारित किया गया। मामला जनपद अंबेडकर नगर के थाना अलापुर से संबंधित है।

मामला क्या है?

प्रकरण के अनुसार, अभियोजन पक्ष ने आरोप लगाया था कि पीड़िता (जिसकी उम्र लगभग 14 वर्ष बताई गई) 20/21 जून 2021 को अचानक लापता हो गई। पीड़िता के पिता द्वारा थाना अलापुर में प्राथमिकी दर्ज कराई गई, जिसमें यह आशंका जताई गई कि किसी अज्ञात व्यक्ति ने उसकी नाबालिग बेटी का अपहरण कर लिया है। प्रारंभ में मामला IPC की धारा 361 और 366 के तहत दर्ज किया गया, बाद में विवेचना के दौरान धारा 376 IPC तथा POCSO एक्ट की धारा 5/6 भी जोड़ी गई।

ट्रायल के बाद विशेष न्यायाधीश, POCSO एक्ट, अंबेडकर नगर ने अभियुक्त को दोषी ठहराते हुए 20 वर्ष की कठोर सजा सुनाई।

हाईकोर्ट में अभियुक्त की ओर से यह दलील दी गई कि वह सजा के बाद केवल कुछ महीनों से जेल में है और मामले में कई गंभीर कानूनी प्रश्न हैं, जिन पर अपील में विस्तृत सुनवाई आवश्यक है।

बचाव पक्ष ने अदालत का ध्यान इस ओर दिलाया कि—

  • FIR में घटना की तिथि और समय को लेकर विरोधाभास है

  • न तो पीड़िता और न ही उसके पिता का मोबाइल फोन बरामद किया गया

  • पीड़िता और अभियुक्त के बीच घटना से पहले लगातार फोन पर बातचीत होती थी

  • पीड़िता स्वयं अभियुक्त से मिलने मेले में गई थी, जहां सैकड़ों लोग और पुलिस मौजूद थी

पीड़िता ने विभिन्न चरणों—धारा 161 CrPC, बयान-ए-पी और जिरह—में अपने बयानों में बदलाव किया

कोर्ट के समक्ष सबसे महत्वपूर्ण सवाल पीड़िता की उम्र को लेकर उठा। स्कूल के ट्रांसफर सर्टिफिकेट में पीड़िता की जन्मतिथि 15 जनवरी 2006 दर्ज थी, जिससे घटना के समय उसकी उम्र लगभग 15 वर्ष 5 माह बनती है। वहीं मेडिकल परीक्षण (बोन ऑसिफिकेशन टेस्ट) में उसकी उम्र 16 से 17 वर्ष के बीच आंकी गई।

बचाव पक्ष ने दलील दी कि मेडिकल रिपोर्ट में उम्र निर्धारण में एक वर्ष की छूट (margin of error) दी जाती है, जिससे पीड़िता की उम्र 18 वर्ष के आसपास मानी जा सकती है।

अदालत ने यह भी विचार किया कि क्या POCSO एक्ट की धारा 29 के तहत अभियोजन को मिलने वाला प्रिजम्पशन स्वतः और पूर्ण (Absolute) है।

बचाव पक्ष ने नवीन धनीराम बरैये बनाम महाराष्ट्र राज्य के निर्णय का उल्लेख करते हुए कहा कि यह प्रिजम्पशन तथ्यों और साक्ष्यों के आधार पर rebuttable है और हर मामले में यांत्रिक रूप से लागू नहीं किया जा सकता।

IPC की धारा 363 और 366 के तहत “ले जाना” या “लुभाना” सिद्ध होता है या नहीं—इस पर भी कोर्ट ने गंभीरता से विचार किया।

पीड़िता ने अपने बयान में स्वीकार किया कि—

  • वह अभियुक्त से प्रेम संबंध में थी

  • वह स्वयं मेले में अभियुक्त से मिली

  • उसने कहीं भी शोर नहीं मचाया

  • वह अभियुक्त के साथ कई दिनों तक अलग-अलग स्थानों पर रही

हाईकोर्ट का निष्कर्ष

सभी तथ्यों, परिस्थितियों और साक्ष्यों पर विचार करते हुए हाईकोर्ट ने पाया कि—

  • पीड़िता के बयान विरोधाभासी हैं

  • अभियुक्त ट्रायल के दौरान जमानत पर था और उसने कोई दुरुपयोग नहीं किया

  • अपील की सुनवाई में काफी समय लगने की संभावना है

  • मामले में कानूनी प्रश्न गहन विचार योग्य हैं

इन परिस्थितियों में न्यायालय ने कहा कि बिना मेरिट पर अंतिम राय व्यक्त किए, अभियुक्त को सजा निलंबन का लाभ दिया जाना न्यायसंगत होगा।

Tags: POCSO एक्ट के तहत 20 साल की सजा पाए
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