लखनऊ, उत्तर प्रदेश में बंदरों के बढ़ते आतंक और मानव-बंदर संघर्ष की समस्या से निपटने के लिए पूरे प्रदेश में प्रभावी कार्रवाई की जरूरत है। लखीमपुर खीरी में इस दिशा में नौ सदस्यीय समिति गठित किए जाने के बीच रीसस मकाक प्रजाति के बंदरों को पकड़ने के लिए स्थानीय निकायों को पूर्व अनुमति लेने की आवश्यकता नहीं होने का प्रावधान महत्वपूर्ण माना जा रहा है।
इस प्रजाति को वन्यजीव संरक्षण अधिनियम की प्रतिबंधित अनुसूचियों से हटाए जाने के बाद बंदरों से प्रभावित शहरी और ग्रामीण क्षेत्रों में नियमानुसार कार्रवाई का रास्ता खुला है।
लखीमपुर खीरी में जिलाधिकारी की अध्यक्षता में गठित नौ सदस्यीय समिति बंदर-मानव संघर्ष कम करने के उपायों की निगरानी करेगी और राज्य सरकार के निर्देशों के अनुरूप मानक संचालन प्रक्रिया (एसओपी) तैयार करेगी।
इसके तहत शहरी क्षेत्रों में नगर पालिकाओं और नगर पंचायतों तथा ग्रामीण क्षेत्रों में ग्राम पंचायतों को बंदरों से प्रभावित इलाकों की पहचान करनी है। समस्या पैदा करने वाले बंदरों को पकड़ने और इस काम में लगे विशेषज्ञों के पंजीकरण की व्यवस्था भी प्रस्तावित है।
दक्षिण खीरी के प्रभागीय वन अधिकारी तापस मिहिर के अनुसार, रीसस मकाक प्रजाति के बंदरों को पकड़ने के लिए स्थानीय निकायों को पूर्व अनुमति लेने की जरूरत नहीं है। पकड़े गए बंदरों को स्वास्थ्य जांच और बीमारी से मुक्त होने का प्रमाण पत्र मिलने के बाद निर्धारित गैर-संरक्षित वन क्षेत्रों में छोड़े जाने की व्यवस्था बताई गई है।
समस्या पैदा करने वाले नर बंदरों के बंध्याकरण का प्रस्ताव भी शामिल है, जिस पर भारतीय वन्यजीव संस्थान की तकनीकी रिपोर्ट और योजना के आधार पर आगे काम किया जाना है।
बंदरों की समस्या केवल एक जिले तक सीमित नहीं है। ऐसे में जरूरत है कि राज्य सरकार संबंधित विभागों और स्थानीय निकायों के समन्वय से प्रदेश के प्रभावित शहरी और ग्रामीण क्षेत्रों की पहचान कराए तथा नियमों के अनुरूप कार्रवाई की स्पष्ट व्यवस्था बनाए। इससे लोगों को राहत देने के साथ बंदरों के प्रबंधन और स्थानांतरण की प्रक्रिया भी व्यवस्थित की जा सकेगी।