गोंडा, सिविल जज शबीना खान और तत्कालीन मंडलायुक्त दुर्गाशक्ति नागपाल के बीच फोन पर हुई बातचीत से उठा विवाद अब न्यायपालिका की स्वतंत्रता और न्यायिक अधिकारियों की गरिमा का बड़ा मुद्दा बन गया है।
यदि न्यायिक अधिकारी के आरोप और फोन पर कही गई बातें जांच में सही पाई जाती हैं तो निश्चित रूप से कानून के अनुसार कार्रवाई होनी चाहिए। किसी भी प्रशासनिक अधिकारी को यह अधिकार नहीं हो सकता कि वह अपने पद का इस्तेमाल कर किसी न्यायिक अधिकारी को प्रभावित करे।
लेकिन इस पूरे मामले के बीच एक बड़ा सवाल है, जिस पर चर्चा जरूरी है। जिस मुकदमे को लेकर यह विवाद पैदा हुआ, वह आखिर 1997 से 2026 तक लंबित क्यों रहा?
न्यायपालिका को बाहरी दबाव से मुक्त रखना लोकतांत्रिक व्यवस्था के लिए जरूरी है। जज को फोन कर किसी लंबित मुकदमे में जल्द फैसला कराने या किसी प्रकार का दबाव बनाने की कोशिश गंभीर विषय है। दुर्गाशक्ति नागपाल के मामले में आरोपों की जांच हो और जो भी तथ्य सामने आएं, उनके आधार पर कार्रवाई हो।
मगर सवाल सिर्फ यहीं खत्म नहीं होता।
विवादित जमीन पर सरकारी कार्यालय बनाने की प्रक्रिया चल रही थी और वर्षों पुराना मुकदमा उसके रास्ते में बाधा बताया जा रहा था। दुर्गाशक्ति नागपाल प्रशासनिक अधिकारी थीं और उनके पास व्यवस्था तक पहुंच थी। उन्होंने मामले को जल्दी निपटाने की कोशिश की। तरीका सही था या गलत, इसका फैसला कानून करेगा।
लेकिन उस आम आदमी का क्या, जिसकी जमीन पर किसी दूसरे व्यक्ति का कब्जा है और जिसके पास न कोई बड़ा पद है, न अधिकारियों तक पहुंच?
वह अदालत जाता है, मुकदमा दायर करता है, वकील की फीस देता है और हर तारीख पर पहुंचता है। फिर अगली तारीख मिलती है। महीने गुजरते हैं, साल गुजरते हैं और कई मामलों में दशक बीत जाते हैं। कभी-कभी जिस व्यक्ति ने मुकदमा शुरू किया था, उसके जीवनकाल में फैसला नहीं आता और उसकी अगली पीढ़ी पैरवी करने लगती है।
यहीं इस पूरे प्रकरण का सबसे बड़ा विरोधाभास सामने आता है।
जिस अधिकारी के पास व्यवस्था तक पहुंच थी, उसने अपने तरीके से मामले को आगे बढ़ाने की कोशिश की और उसका तरीका न्यायिक स्वतंत्रता के सवाल में बदल गया। लेकिन जिस नागरिक के पास कोई ताकत नहीं है, उसकी समस्या व्यवस्था तक पहुंचेगी कैसे? वह सिर्फ अगली तारीख का इंतजार कर सकता है।
यह तर्क दुर्गाशक्ति नागपाल को सही साबित करने के लिए नहीं है। किसी अधिकारी को न्यायपालिका पर दबाव डालने का अधिकार नहीं हो सकता। लेकिन न्यायिक स्वतंत्रता का अर्थ केवल इतना भी नहीं होना चाहिए कि जज पर बाहर से दबाव न पड़े। इसका अर्थ यह भी होना चाहिए कि न्याय मांगने वाला व्यक्ति अनिश्चितकाल तक न्याय की प्रतीक्षा में न रहे।
क्योंकि न्याय में देरी भी एक गंभीर समस्या है।
वर्षों तक मुकदमा चलने का फायदा अक्सर कब्जे वाले पक्ष को मिलता है। वह संपत्ति का उपयोग करता रहता है, जबकि दूसरा पक्ष अदालतों के चक्कर, वकीलों की फीस और मानसिक तनाव का बोझ उठाता है। कई मामलों में मूल पक्षकार की मृत्यु के बाद वही मुकदमा बच्चों और पोते-पोतियों तक पहुंच जाता है।
इसलिए सवाल सिर्फ यह नहीं होना चाहिए कि दुर्गाशक्ति नागपाल ने न्यायिक अधिकारी से अनुचित तरीके से संपर्क किया या नहीं। इसका फैसला कानून के अनुसार होना चाहिए। लेकिन यह संस्थागत सवाल भी पूछा जाना चाहिए कि 1997 में शुरू हुआ मुकदमा करीब तीन दशक तक लंबित क्यों रहा?
कितनी बार सुनवाई टली? कितनी बार स्थगन लिया गया? साक्ष्य पूरा होने में कितना समय लगा? कौन सा चरण वर्षों तक अटका रहा? पुराने मुकदमों की जवाबदेही तय क्यों नहीं होनी चाहिए?
न्यायपालिका से देरी पर सवाल पूछना उसकी स्वतंत्रता पर हमला नहीं है। बल्कि यह न्याय व्यवस्था को मजबूत करने की मांग है। अगर किसी प्रभावशाली व्यक्ति के मामले में न्यायिक प्रक्रिया को प्रभावित करने की कोशिश गंभीर मानी जाती है, तो उन लाखों आम नागरिकों के मामलों के प्रति भी उतनी ही संवेदनशीलता होनी चाहिए, जो वर्षों से अदालतों में लंबित हैं।
उनके पास किसी जज को फोन करने की ताकत नहीं है। वे सिर्फ तारीख का इंतजार करते हैं।
दुर्गाशक्ति नागपाल के मामले में कानून अपना काम करे और न्यायिक अधिकारी की गरिमा की हर हाल में रक्षा हो। लेकिन अगर समाधान सिर्फ इतना है कि अधिकारी फोन न करें, तो फोन तो बंद हो जाएगा, मगर मुकदमे वर्षों तक चलते रहेंगे।
असली न्याय तब होगा, जब किसी अधिकारी को लंबित मुकदमे के लिए फोन करने की जरूरत न पड़े और किसी आम नागरिक को अपनी जमीन या संपत्ति के लिए पीढ़ियों तक अदालत के चक्कर न लगाने पड़ें।










