लखनऊ, इलाहाबाद हाईकोर्ट की लखनऊ पीठ ने POCSO एक्ट से जुड़े एक गंभीर आपराधिक मामले में अहम आदेश पारित करते हुए दोषसिद्ध अभियुक्त दिलीप विश्वकर्मा को बड़ी राहत दी है।
न्यायालय ने अभियुक्त की अपील लंबित रहने तक उसकी सजा को निलंबित करते हुए जमानत पर रिहा करने का आदेश दिया है। अभियुक्त को ट्रायल कोर्ट द्वारा IPC की धारा 376 एवं POCSO एक्ट की धारा 3/4 के अंतर्गत 10 वर्ष की कठोर कारावास की सजा सुनाई गई थी। इसके अतिरिक्त IPC की धारा 363 के तहत 5 वर्ष तथा धारा 366 के तहत 7 वर्ष के कारावास की सजा भी दी गई थी, जो सभी सजाएं साथ-साथ चलने के आदेश के साथ दी गई थीं।
यह आदेश माननीय न्यायमूर्ति राम मनोहर नारायण मिश्र द्वारा पारित किया गया। मामला जनपद अंबेडकर नगर के थाना बसखारी से संबंधित है।
मामला क्या है?
प्रकरण के अनुसार, अभियोजन पक्ष ने आरोप लगाया था की 03.07.2013 को पीड़िता ‘x’ और ‘y’ उम्र 16 वर्ष एक साथ स्कूल एडमिशन लेने जा रही थी, जब शाम तक नहीं लौट के आयी तब पता करने पर मालूम पड़ा कि मोहम्मद अशरफ़ और दिलीप विश्वकर्मा, जिनकी मदद किया पड़ोस के गाँव के मोहम्मद आमिर, पप्पी उर्फ सरबजीत, शीला और मीरा ने अपहरण कर लिया है | मोहम्मद अशरफ नाबालिक होने के कारण उसका केस जुवेनाइल बोर्ड को ट्रांसफर कर दिया गया, और ट्रायल के दौरान मोहम्मद आमिर, पप्पी उर्फ सरबजीत, शीला और मीरा को न्यायालय ने साक्ष्य के अभाव में बरी कर दिया |
हाईकोर्ट में दोषी दिलीप विश्वकर्मा की ओर अधिवक्ता अभिनव श्रीवास्तव द्वारा यह दलील दी गई कि वह सजा के बाद केवल कुछ महीनों से जेल में है और मामले में कई गंभीर कानूनी प्रश्न हैं, जिन पर अपील में विस्तृत सुनवाई आवश्यक है।
बचाव पक्ष ने अदालत का ध्यान इस ओर दिलाया कि —
FIR 9 दिन देरी से लिखवाई गई इस दौरान परिवार की तरफ़ से थाने में कोई भी गुमशुदगी की रिपोर्ट नहीं दी गई, तहरीर में भी देरी का कारण नहीं बताया गया, न ही न्यायालय के समक्ष बयान में, जिससे स्पष्ट है कि यह जान कर देरी से लोगो से समझ बूझ कर लिखवाई गई FIR है |
दोषी दिलीप विश्वकर्मा द्वारा पीड़िता ‘x’ को भगा कर 54 दिन तक अंबेडकर नगर से गुजरात की भिन्न-भिन्न जगह रखने और उसके बाद लखनऊ लाने और फिर गुजरात ले जाने का आरोप तह किया गया, मगर पीड़िता द्वारा किसी भी जगह पर कोई अलार्म/ या शोर या अपतत्ति दर्ज नहीं करायी गई |
पीड़िता ने न्यायालय के सामने अपने बयान में कहा कि उसे 54 दिन तक एक ही कमरे में बंद करके गुजरात में रखा गया, ना तो उस जगह का कोई नक़्शा – नजरी है, ना आस पड़ोस वालों का बयान है, और ना है उस मोबाइल नंबर का सीडीआर लोकेशन है जिससे पीड़िता ने अपने भाई को फ़ोन किया था |
पीड़िता ‘x’ ने लखनऊ के आर्य समाज मंदिर में दोषी से हिंदू वैदिक रीति-रिवा से शादी की, और उच्च न्यायालय के सामने उपस्थित होकर प्रोटेक्शन आदेश प्राप्त किया, इस दौरान उसने मन्नयीय उच्च न्यायालय को यह बताया कि वह बालिक है और अपनी मर्जी से शादी की है, मुकदमे में पीड़िता ‘x’ के पिता ने भी कोई आपत्ति नहीं दाखिल किया |
पीड़िता ने न्यायालय में अपने बयान में कहा है कि उसकी रिकवरी गुजरात के एक कमरे से हुई है, मगर फ़र्द बरामदगी में पुलिस ने उसको दोषी के साथ हाथ में हाथ डाल कर गुजरात के रेलवे स्टेशन पर रात में घूमते पकड़ा था, जिससे फ़र्द बरामदगी और दोषी की गिरफ्तारी भी संदेहास्पद हो जाती |
पीड़िता ने अपनी उम्र 16 वर्ष बतायी, उसने दोषी से शादी की, और बलात्कार का आरोप लगाया, ipc की धारा 375 एक्सेप्शन 2 के अनुसार ipc 376 पत्नी के द्वारा जिसकी उम्र 15 साल से अधिक हो नहीं लगाया जा सकता है |
पीड़िता ‘x’ के न्यायालय के सामने दिए गए बयान अनुसार वह बरामदगी के बाद 10 दिन पुलिस कस्टडी में रही है, और पिता के सुपुर्दगी नामा अनुसार उसकी लड़की बरामदगी के दो दिन बाद ही उसको सौप दी गई थी, विरोधास्प्तद है |
सभी तथ्यों, परिस्थितियों और साक्ष्यों पर विचार करते हुए हाईकोर्ट ने पाया कि—
अभियुक्त ट्रायल के दौरान जमानत पर था और उसने कोई दुरुपयोग नहीं किया
अपील की सुनवाई में काफी समय लगने की संभावना है
मामले में कानूनी प्रश्न गहन विचार योग्य हैं
इन परिस्थितियों में न्यायालय ने कहा कि बिना मेरिट पर अंतिम राय व्यक्त किए, अभियुक्त को सजा निलंबन का लाभ दिया जाना न्यायसंगत होगा।




