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मराठवाड़ा में मतदान : विरोधाभासी विमर्श और बंटी हुई राजनीतिक निष्ठा से चुनाव हुआ दिलचस्प

admin by admin
November 18, 2024
in देश, राजनीति
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छत्रपति संभाजीनगर/बीड, महाराष्ट्र के अन्य हिस्सों की तरह मराठवाड़ा में भी चुनाव प्रचार अपने अंतिम दौर में पहुंच चुका है और यहां पर कृषि क्षेत्र में संकट और ‘लाडकी बहिन’ योजना, खंडित राजनीतिक निष्ठा और मराठा आरक्षण कार्यकर्ता मनोज जरांगे पाटिल का स्वयं का गृह क्षेत्र होना एवं विरोधाभासी विमर्श मतदान की परिपाटी को प्रभावित कर सकता है।

कई स्थानों पर किसानों ने कपास और सोयाबीन जैसी फसलों की कम कीमत मिलने की शिकायत की हैं, लेकिन कल्याणकारी पहलों, विशेषकर महिलाओं के लिए नकद हस्तांतरण योजना की प्रशंसा भी इस सूखाग्रस्त क्षेत्र में स्पष्ट रूप से देखी जा सकती है।

जादगांव में एक निजी फर्म में कार्यरत और किसान सुनील गायकवाड़ खुद को अनुच्छेद 370 हटाने और अयोध्या में राम मंदिर निर्माण के लिए भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) का कट्टर समर्थक बताते हैं। लेकिन, वह साथ ही कहते हैं कि एक किसान के तौर उन्हें रोजाना संघर्ष करना पड़ता है।

गायकवाड़ ने बिक्री रसीद दिखाते हुए कहा, ‘‘सोयाबीन के लिए मुझे जो कीमत मिली, वह बहुत कम थी। उन्हें प्रति क्विंटल उपज के लिए करीब 3,900 रुपये मिले।

गायकवाड़ जब बात कर रहे थे, तभी मराठा युवकों का एक समूह वहां पहुंचा, उनकी गाड़ियों पर ‘‘योद्धा’’ पाटिल की तस्वीरें लगी थीं। वे ‘महायुति’ सरकार का विरोध करते हुए कहते हैं कि सरकार ने उनके समुदाय को ओबीसी कोटे के तहत आरक्षण नहीं दिया, जो राज्य की आबादी का 28 प्रतिशत है और इस क्षेत्र में अपेक्षाकृत अधिक प्रभावशाली है।

एक युवक नारा लगाता है, “मराठा जिधर खड़ा, वो सरकार से बड़ा” (जिसके साथ मराठा खड़े होते हैं, वह सरकार से अधिक शक्तिशाली होता है) लेकिन उसी का मित्र कहता है कि समुदाय के वोट बंटेंगे ही, क्योंकि उनके नेता हर पार्टी में मौजूद हैं।

इंजीनियरिंग के छात्र महेश पाटिल के मुताबिक जरांगे पाटिल का असर युवा मतदाताओं पर होगा। आरक्षण कार्यकर्ता ने किसी पार्टी का नाम नहीं लिया है, लेकिन मराठा समुदाय को आरक्षण न देने के लिए जिम्मेदार लोगों को हराने के उनके आह्वान को उनके समर्थकों द्वारा सत्तारूढ़ भाजपा-शिवसेना-राकांपा गठबंधन के खिलाफ वोट देने के स्पष्ट संकेत के रूप में देखा जा रहा है।

मराठा आरक्षण की मांग को लेकर राज्य में हुए आंदोलन का सबसे अधिक असर मराठवाड़ा में देखने को मिला है। इसने मराठवाड़ा में सामाजिक मतभेदों को और गहरा किया। इस क्षेत्र में सत्तारूढ़ गठबंधन की ओर से भाजपा ने सबसे अधिक उम्मीदवार उतारे हैं और उसे उम्मीद है कि वह अन्य समुदायों के मतों के बदौलत मराठा वोटों में होने वाले किसी भी संभावित नुकसान की भरपाई कर लेगी।

वाडीगोदरी में किसानों का एक समूह खुद को पारंपरिक शिवसेना समर्थक बताता है। वे मुख्यमंत्री एकनाथ शिंदे के व्यावहारिक दृष्टिकोण और कल्याणकारी कार्यों की प्रशंसा करते हैं, लेकिन साथ ही तत्कालीन अविभाजित शिवसेना अध्यक्ष उद्धव ठाकरे के खिलाफ अधिकतर विधायकों की बगावत के लिए उन्हें दोषी भी ठहराते हैं।

अविभाजित शिवसेना नेतृत्व से शिंदे की बगावत की वजह से उद्धव ठाकरे के नेतृत्व वाली तत्कालीन महा विकास आघाडी (एमवीए) सरकार गिर गई थी।

महेंद्र गाडवे ने शिवसेना और राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी (राकांपा) जैसी क्षेत्रीय पार्टियों में विभाजन पर अफसोस जताते हुए कहते हैं, ‘‘शिंदे का काम अच्छा है। लेकिन उन्हें शिवसेना पर दावा करने के बजाय अपनी खुद की पार्टी बनानी चाहिए थी।’’

शिंदे के नेतृत्व वाली शिवसेना और ठाकरे के नेतृत्व वाला गुट, दोनों ही मराठवाड़ा के 46 निर्वाचन क्षेत्रों में से 16-16 सीटों पर चुनाव लड़ रहे हैं। दोनों गुटों का भविष्य इस बात से तय होगा कि 20 नवंबर को मतदान के दिन गाडवे जैसे पुराने समर्थक किसके पक्ष में फैसला करते हैं।

शिंदे सरकार द्वारा शुरू की गई ‘लाडकी बहिन’ योजना की समाज के सबसे गरीब तबके ने विशेष रूप से प्रशंसा की है। काचीपुरा में अनुसूचित जाति के लोगों की बहुलता वाली बस्ती में रहने वाले सुरेश शिंदे और उनकी पत्नी सुरेखा, दोनों ही दिहाड़ी मजदूर हैं और उन्हें लगता है कि हर महीने मिलने वाले 1,500 रुपये से उनकी बड़ी मदद होती है।

राज्य की राजनीति में उथल-पुथल के कारण कई अनुभवी नेता नयी विचारधाराओं को अपना रहे हैं तथा अपने पारंपरिक प्रतिद्वंद्वियों के साथ गठबंधन कर रहे हैं, और इसके अपने परिणाम भी सामने आ रहे हैं।

बीड की परली विधानसभा सीट पर भाजपा नेता पंकजा मुंडे के कई समर्थक उनके चचेरे भाई और राकांपा नेता धनंजय मुंडे को वोट देने को लेकर असमंजस में हैं। दोनों नेता लंबे समय से प्रतिद्वंद्वी थे और धनंजय ने 2019 के विधानसभा चुनावों में पंकजा को हराया था। अजित पवार के नेतृत्व वाली राकांपा अब भाजपा की सहयोगी है और धनंजय ‘महायुति’ के उम्मीदवार हैं। पंकजा ने उनके लिए प्रचार करके अतीत को पीछे छोड़ने का प्रयास किया है।

स्थानीय नेताओं ने कहा कि पूर्व मुख्यमंत्री अशोक चव्हाण के सामने भी ऐसी ही स्थिति है। वह कांग्रेस के पुराने नेता रहे हैं और इस साल की शुरुआत में भाजपा में शामिल हो गए हैं। भाजपा ने उन्हें राज्यसभा के लिए मनोनीत करने के बाद उनकी पारंपरिक भोकर सीट से उनकी बेटी श्रीजया चव्हाण को मैदान में उतारा है।

भाजपा ने यह सीट कभी नहीं जीती है और मराठा समुदाय के नेता चव्हाण अपनी क्षमता साबित करने के लिए कड़ी मेहनत कर रहे हैं। हाल के लोकसभा चुनाव में भाजपा नांदेड़ सीट हार गई थी जहां पर चव्हाण का काफी प्रभाव माना जाता था।

लोकसभा चुनाव में ‘महायुति’ मराठवाड़ा में आठ सीट में से एक को छोड़कर बाकी सभी पर हार गई थी। हालांकि, इसके नेताओं को उम्मीद है कि राज्य सरकार द्वारा उठाए गए कल्याणकारी कदमों से सत्तारूढ़ गठबंधन को मदद मिलेगी।

Tags: विरोधाभासी विमर्श और बंटी हुई राजनीतिक निष्ठा
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