नई दिल्ली, उच्चतम न्यायालय के न्यायाधीश उज्ज्वल भुइयां ने बृहस्पतिवार को एक अहम फैसले में कहा कि गिरफ्तारी की 24 घंटे की समय-सीमा औपचारिक गिरफ्तारी दर्ज किए जाने से नहीं, बल्कि व्यक्ति को हिरासत में लिए जाने के समय से शुरू होती है।
न्यायमूर्ति भुइयां हाल के महीनों में सार्वजनिक व्याख्यानों और शैक्षणिक कार्यक्रमों में मतदान के अधिकार, न्यायिक नियुक्तियों, कॉलेजियम की कार्यप्रणाली, असहमति और संवैधानिक नैतिकता जैसे मुद्दों पर भी अपनी राय रखते रहे हैं।
14 जुलाई 2023 को उच्चतम न्यायालय के न्यायाधीश नियुक्त किए गए न्यायमूर्ति भुइयां ने चार अक्टूबर को हैदराबाद स्थित नालसार यूनिवर्सिटी ऑफ लॉ में आयोजित एक मूट कोर्ट प्रतियोगिता के समापन कार्यक्रम में मतदान के अधिकार पर टिप्पणी की थी।
उन्होंने कहा था कि यदि किसी प्रक्रिया के कारण बड़ी संख्या में नागरिक अपने ही देश में मतदान के अधिकार से वंचित हो जाएं, तो ऐसी प्रक्रिया मनमानी होगी और उसे किसी भी दलील से उचित नहीं ठहराया जा सकता।
मेघालय के यूनिवर्सिटी ऑफ साइंस एंड टेक्नोलॉजी के 12वें दीक्षांत समारोह में 31 अक्टूबर को उन्होंने कहा था कि सवाल पूछने से डरने वाला समाज तानाशाही की चपेट में आ सकता है। इसी कार्यक्रम में उन्होंने उच्चतम न्यायालय में महिलाओं की कम संख्या पर भी टिप्पणी की थी। उनके अनुसार, अदालत में महिलाओं की मौजूदगी देश में महिला वकीलों और महिलाओं के वास्तविक अनुपात को नहीं दर्शाती।
न्यायिक नियुक्तियों और कॉलेजियम की कार्यप्रणाली पर भी न्यायमूर्ति भुइयां ने सवाल उठाए हैं। पुणे के आईएलएस लॉ कॉलेज में 24 जनवरी को उन्होंने कहा था कि जब कॉलेजियम अपने रिकॉर्ड में यह दर्ज करता है कि किसी न्यायाधीश का तबादला केंद्र सरकार के अनुरोध पर किया जा रहा है, तो यह गंभीर हस्तक्षेप का संकेत है।
उनकी यह टिप्पणी न्यायमूर्ति अतुल श्रीधरन के तबादले की सिफारिश में बदलाव के बाद आई थी। कॉलेजियम ने उन्हें मध्य प्रदेश उच्च न्यायालय से इलाहाबाद उच्च न्यायालय भेजने के बजाय छत्तीसगढ़ उच्च न्यायालय स्थानांतरित करने का निर्णय लिया था।
न्यायिक नियुक्तियों में पारदर्शिता पर आयोजित एक कार्यक्रम में न्यायमूर्ति भुइयां ने कॉलेजियम के फैसलों के कारण सार्वजनिक न किए जाने को पारदर्शिता के सिद्धांत से पीछे हटना बताया था। उन्होंने कहा था कि निर्णयों के पीछे के कारणों को दर्ज करना और स्पष्ट करना जरूरी है।
असहमति के अधिकार पर भोपाल स्थित नेशनल लॉ इंस्टीट्यूट यूनिवर्सिटी में बोलते हुए उन्होंने वाराणसी में गंगा नदी पर नाव में चिकन बिरयानी खाने के आरोप में गिरफ्तार किए गए 14 मुस्लिम युवाओं का उल्लेख किया था। उन्होंने कहा था कि चिकन बिरयानी खाना अपराध नहीं है और इस मामले में युवाओं को तीन महीने तक जेल में रहना पड़ा।
फरवरी में एक सेमिनार के दौरान न्यायमूर्ति भुइयां ने संवैधानिक गारंटियों और रोजमर्रा के भेदभाव के बीच अंतर पर भी बात की थी। उन्होंने बताया था कि उनकी बेटी की एक मुस्लिम सहेली को धर्म के कारण दिल्ली में किराये पर रहने की जगह नहीं मिली।