दिल्ली उच्च न्यायालय ने शुक्रवार को एक महिला पत्रकार की उस याचिका पर तत्काल आदेश देने से इनकार कर दिया, जिसमें जंतर-मंतर के पास प्रदर्शन के दौरान एक सहायक पुलिस आयुक्त (एसीपी) के खिलाफ कथित जातिसूचक टिप्पणी और सार्वजनिक रूप से अपमानित करने के आरोप में दर्ज प्राथमिकी की जांच पर रोक लगाने की मांग की गई थी।
न्यायमूर्ति मिनी पुष्कर्णा ने कहा कि दिल्ली पुलिस का पक्ष सुने बिना इस मामले में कोई आदेश पारित नहीं किया जा सकता। अदालत ने याचिका पर अगली सुनवाई 27 अक्टूबर को तय की है।
महिला पत्रकार की ओर से अधिवक्ता साइमन फारूकी ने याचिका दाखिल कर प्राथमिकी की जांच पर रोक लगाने की मांग की थी। सुनवाई के दौरान उनके वकील ने तत्काल राहत देने का अनुरोध करते हुए कहा कि मामले में उसी दिन जांच पर रोक लगाने का आदेश दिया जाना चाहिए।
इस पर न्यायमूर्ति ने स्पष्ट किया कि दूसरे पक्ष को सुने बिना ऐसा आदेश पारित नहीं किया जा सकता। उच्च न्यायालय 19 से 26 अक्टूबर तक दशहरा अवकाश के कारण बंद रहेगा।
सुनवाई के दौरान महिला पत्रकार के वकील ने यह भी कहा कि उच्चतम न्यायालय ने बृहस्पतिवार को महिला पत्रकार के खिलाफ कोई दंडात्मक कार्रवाई नहीं करने का निर्देश दिया था। उन्होंने राज्य सरकार के वकील से उच्च न्यायालय में भी इस संबंध में आश्वासन देने का अनुरोध किया।
वकील ने आरोप लगाया कि एसीपी के खिलाफ यौन उत्पीड़न की शिकायत पर आगे कार्रवाई करने से रोकने और महिला पत्रकार को डराने के उद्देश्य से प्राथमिकी दर्ज कराई गई थी। वहीं, राज्य सरकार की ओर से कहा गया कि महिला पत्रकार को उच्चतम न्यायालय से पहले ही संरक्षण मिल चुका है।
यह मामला उस शिकायत से जुड़ा है, जो दिल्ली पुलिस में तैनात एसीपी विवेक भगत ने दर्ज कराई थी। दिल्ली पुलिस ने स्वतंत्र महिला पत्रकार और अन्य लोगों के खिलाफ प्राथमिकी दर्ज की है। भगत का आरोप है कि तीन अक्टूबर को जंतर-मंतर के पास बूटा सिंह गोलचक्कर के निकट कानून-व्यवस्था की ड्यूटी के दौरान उनके खिलाफ कथित जातिसूचक टिप्पणियां की गईं, उन्हें सार्वजनिक रूप से अपमानित किया गया और उनकी मानहानि की गई।
प्राथमिकी के अनुसार, एसीपी भगत ने आरोप लगाया कि महिला पत्रकार ने उनकी मेघ या मेघवाल जाति को लेकर अपमानजनक टिप्पणी की और उनके एसीपी पद पर नियुक्त होने पर सवाल उठाए। शिकायतकर्ता का कहना है कि उन्होंने इन टिप्पणियों को नजरअंदाज कर अपनी आधिकारिक ड्यूटी जारी रखी।
हालांकि, उसी दिन दोपहर करीब तीन बजे प्रदर्शनकारियों को संभालने और हिरासत में लेने की कार्रवाई के दौरान महिला पत्रकार ने कथित तौर पर उन पर यौन उत्पीड़न का आरोप लगाया। भगत का आरोप है कि इसके बाद महिला पत्रकार और उनके सहकर्मियों ने उनसे बार-बार बहस की, जिससे सरकारी कार्य में बाधा पहुंची।
एसीपी ने यह भी आरोप लगाया कि महिला पत्रकार और कॉकरोच जनता पार्टी (कॉजपा) के कुछ सदस्यों ने सोशल मीडिया मंच एक्स और इंस्टाग्राम पर पोस्ट तथा रील साझा कीं, जिनमें उनके खिलाफ आरोप लगाए गए थे। इस मामले में अभिजीत दीपके, आशुतोष रांका, सौरव दास और रत्ना सिंह के नाम भी शिकायत में शामिल बताए गए हैं।
दिल्ली पुलिस ने प्राथमिकी अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति (अत्याचार निवारण) अधिनियम की संबंधित धाराओं तथा भारतीय न्याय संहिता की धारा 221, धारा 356(2) और धारा 3(5) के तहत दर्ज की है।
इन प्रावधानों में लोक सेवक के कर्तव्य निर्वहन में बाधा डालने, मानहानि और साझा मंशा से संबंधित आरोप शामिल हैं। मामले में लगाए गए आरोपों की जांच जारी है और अदालत ने अभी प्राथमिकी की जांच पर रोक लगाने की मांग पर कोई अंतिम फैसला नहीं दिया है।
उच्च न्यायालय ने महिला पत्रकार के एक पुरुष सहकर्मी की उस याचिका पर सुनवाई भी स्थगित कर दी, जिसमें उसके खिलाफ दर्ज प्राथमिकी को रद्द करने की मांग की गई है। दोनों मामलों में आगे की सुनवाई 27 अक्टूबर को होने की संभावना है।