लखनऊ, इलाहाबाद उच्च न्यायालय की लखनऊ पीठ ने बहराइच में गैंगस्टर्स एक्ट के तहत तैयार किए गए गैंग चार्ट को कथित तौर पर बिना पर्याप्त विचार-विमर्श और स्वतंत्र विवेक के मंजूरी देने पर पुलिस अधीक्षक (SP) और जिलाधिकारी (DM) की कार्यप्रणाली पर कड़ी टिप्पणी की है।
न्यायमूर्ति मनीष माथुर की पीठ ने कहा कि गैंग चार्ट को महज औपचारिकता के रूप में मंजूर नहीं किया जा सकता, क्योंकि इसके आधार पर किसी व्यक्ति के खिलाफ गंभीर आपराधिक कार्रवाई शुरू होती है।
मामला बहराइच के पयागपुर थाने में वर्ष 2021 में दर्ज गैंगस्टर्स एक्ट की कार्रवाई से जुड़ा था। याचिकाकर्ता ने अपने खिलाफ शुरू की गई कार्यवाही को चुनौती देते हुए आरोप लगाया था कि गैंग चार्ट को तैयार और मंजूर करते समय अधिकारियों ने आवश्यक प्रक्रिया का पालन नहीं किया।
अदालत के रिकॉर्ड के अनुसार गैंग चार्ट 10 नवंबर 2021 को आगे भेजा गया था। इसके बाद 11 नवंबर को अपर पुलिस अधीक्षक और पुलिस अधीक्षक ने इसे मंजूरी दी, जबकि जिलाधिकारी ने 15 नवंबर 2021 को अपनी स्वीकृति दी।
हाईकोर्ट ने पाया कि गैंग चार्ट को मंजूरी देते समय न तो SP और न ही DM ने आरोपी के आपराधिक इतिहास पर स्वतंत्र रूप से विचार करने, कारण दर्ज करने या किसी वास्तविक विचार-विमर्श का संकेत दिया। अदालत ने कहा कि अधिकारियों को आरोपी की आपराधिक पृष्ठभूमि और गतिविधियों की जांच करने के बाद अपने स्वतंत्र विवेक से संतुष्टि दर्ज करनी चाहिए। अदालत ने यह भी कहा कि दोनों अधिकारियों द्वारा अलग-अलग तारीखों में मंजूरी दिया जाना आवश्यक परामर्श और विचार-विमर्श के अभाव की ओर संकेत करता है।
पीठ ने संवैधानिक अदालतों के पुराने फैसलों का हवाला देते हुए कहा कि गैंग चार्ट की मंजूरी एक यांत्रिक या नियमित प्रक्रिया नहीं हो सकती। अदालत ने यह भी उल्लेख किया कि सुप्रीम कोर्ट के फैसलों के अनुसार मंजूरी देने वाले अधिकारी की संतुष्टि और स्वतंत्र रूप से विवेक का इस्तेमाल आवश्यक है।
इसके बाद हाईकोर्ट ने 15 नवंबर 2021 के गैंग चार्ट, 19 फरवरी 2022 की चार्जशीट, 7 दिसंबर 2022 के संज्ञान एवं समन आदेश तथा संबंधित गैंगस्टर्स एक्ट की पूरी आपराधिक कार्यवाही को रद्द कर दिया। अदालत ने संबंधित अधिकारियों को संवैधानिक अदालतों द्वारा तय कानूनी सिद्धांतों का पालन करने और सरकारी कार्रवाई में निष्पक्षता सुनिश्चित करने का निर्देश दिया।