नयी दिल्ली, सुप्रीम कोर्ट बार एसोसिएशन (एससीबीए) ने भारत के प्रधान न्यायाधीश (सीजेआई) बी आर गवई और विधि मंत्री अर्जुन राम मेघवाल को पत्र लिखकर प्रक्रिया ज्ञापन (एमओपी) को अंतिम रूप देने और उच्चतम न्यायालय तथा उच्च न्यायालयों में न्यायाधीशों की नियुक्ति के लिए एक ‘‘पारदर्शी, न्यायसंगत और योग्यता-आधारित’’ ढांचा स्थापित करने की मांग की है।
एससीबीए अध्यक्ष एवं वरिष्ठ अधिवक्ता विकास सिंह ने 12 सितंबर को प्रधान न्यायाधीश और मेघवाल को पत्र लिखकर मौजूदा कॉलेजियम प्रणाली में संरचनात्मक खामियों की ओर इशारा किया और कहा कि सुधार में देरी न्यायिक अखंडता और जनता के विश्वास दोनों को कमजोर कर रही है।
उन्होंने कहा कि कॉलेजियम प्रणाली न्यायिक स्वतंत्रता की रक्षा के लिए बनाई गई थी, लेकिन इसने अनजाने में गंभीर चुनौतियों को जन्म दे दिया।
सिंह ने कहा कि कॉलेजियम नियमित रूप से एससीबीए के योग्य वकीलों को उनके संबंधित राज्यों के उच्च न्यायालयों में पदोन्नति के लिए नजरअंदाज़ करता रहा है, जबकि उन्हें राष्ट्रीय न्यायशास्त्र का व्यापक अनुभव है।
उन्होंने कहा, ‘‘वर्तमान कॉलेजियम व्यवस्था, न्यायिक स्वतंत्रता को बनाए रखने के लिए डिज़ाइन की गई है, लेकिन इसने अनजाने में कई चुनौतियां खड़ी कर दी हैं। इसकी संरचनात्मक खामियां तत्काल और व्यापक सुधार की मांग करती हैं।
उन्होंने न्यायपालिका में महिलाओं के ‘‘चिंताजनक’’ कम प्रतिनिधित्व की ओर भी इशारा किया और आधिकारिक आंकड़ों का हवाला दिया।
उन्होंने कहा, ‘‘यह कोई अमूर्त चिंता नहीं, बल्कि ठोस आंकड़ों से प्रमाणित एक वास्तविकता है। फरवरी 2024 तक, उच्च न्यायालयों में स्वीकृत संख्या में महिलाओं की संख्या केवल 9.5 फीसदी और सर्वोच्च न्यायालय में केवल 2.94 फीसदी थी।
एससीबीए अध्यक्ष ने ‘ब्रीफिंग वकीलों’ (मुकदमे की जानकारी देने वाले वकीलों) को हाशिये पर डालने के मुद्दे पर कहा कि मौजूदा प्रक्रिया लगभग पूरी तरह से बहस करने वाले वकीलों पर केंद्रित है, जबकि ‘ब्रीफिंग वकीलों’ और कनिष्ठ वकीलों की अनदेखी की जाती है, जबकि ऐसे वकील अक्सर मुकदमेबाजी के ‘अदृश्य वास्तुकार’ होते हैं।
उन्होंने प्रधान न्यायाधीश को लिखा, ‘‘केवल दृश्यमान चेहरे को उभारना योग्यता की एक त्रुटिपूर्ण समझ को बनाए रखना है। उन्होंने कहा कि सर्वोच्च न्यायालय ने पहले ही एमओपी में संशोधन के लिए एक सुधार खाका तैयार कर दिया है।
सिंह ने जोर देकर कहा कि ये निर्देश न केवल आकांक्षात्मक हैं, बल्कि कार्यान्वयन योग्य भी हैं, और इनके कार्यान्वयन में किसी भी प्रकार की और देरी ‘अक्षम्य’ है।


