प्रयागराज, इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने हाल में उत्तर प्रदेश सरकार द्वारा जारी अध्यादेश को चुनौती देने वाली एक रिट याचिका पर राज्य सरकार से जवाब तलब किया है। इस अध्यादेश में सरकार ने अपनी नजूल भूमि नीति में परिवर्तन की घोषणा की है।
परिवर्तन नीति के तहत नजूल भूमि को ‘फ्रीहोल्ड’ (ऐसी संपत्ति जिस पर उसके मालिक के अलावा और किसी का अधिकार नहीं होता) नहीं कराया जा सकेगा और पट्टे की मियाद खत्म होने पर नजूल भूमि का पट्टा आगे नहीं बढ़ाया जा सकेगा। इस पहल का उद्देश्य है कि नजूल की जिस भूमि के पट्टे की अवधि पूरी हो गई है, वह भूमि सरकार में निहित हो जाए।
डॉक्टर अशोक तहिलियानी द्वारा दायर रिट याचिका पर सुनवाई करते हुए न्यायमूर्ति सौमित्र दयाल सिंह और न्यायमूर्ति सुरेन्द्र सिंह की खंडपीठ ने इस मामले की अगली सुनवाई की तिथि पांच अप्रैल, 2024 तय की।
सुनवाई के दौरान, याचिकाकर्ता के वकील राहुल श्रीपत ने दलील दी कि मौजूदा मामला तत्काल सुनवाई योग्य है क्योंकि संपत्ति को ध्वस्त किए जाने का खतरा है।
हालांकि राज्य सरकार की ओर से पेश हुए मुख्य स्थायी अधिवक्ता कुणाल रवि सिंह और स्थायी अधिवक्ता निमई दास ने कहा कि आज की तिथि तक याचिकाकर्ता को बेदखल करने के लिए या किसी निर्माण को ध्वस्त करने के लिए कोई कदम नहीं उठाए गए हैं।
उत्तर प्रदेश सरकार ने सात मार्च, 2024 को उत्तर प्रदेश नजूल संपत्ति (सार्वजनिक उद्देश्य के लिए प्रबंधन एवं उपयोग) अध्यादेश, 2024 अधिसूचित किया जिसके तहत किसी नजूल भूमि को किसी निजी व्यक्ति या निजी इकाई के पक्ष में फ्रीहोल्ड में परिवर्तित नहीं किया जाएगा। इसके अलावा, पट्टे की अवधि समाप्त होने पर नजूल भूमि के पट्टे को आगे नहीं बढ़ाया जा सकेगा।
नजूल का अर्थ ऐसी किसी भूमि या भवन से है जो सरकारी रिकॉर्ड में सरकार की संपत्ति है। इसमें वे सभी संपत्तियां शामिल हैं जिनका पट्टा, लाइसेंस या कब्जा सरकार द्वारा अधिसूचना जारी कर किसी कानून के तहत दिया गया हो।
उल्लेखनीय है कि राज्य सरकार ने 1992 में नजूल भूमि को ‘फ्रीहोल्ड’ कराने की नीति का अध्यादेश जारी किया था जिसके बाद बड़ी संख्या में लोगों ने निर्धारित शुल्क जमा कर नजूल की भूमि को ‘फ्रीहोल्ड’ कराया था।
कई वर्ष बीतने के बाद राज्य सरकार को विकास कार्यों के लिए जमीन की भारी किल्लत महसूस हुई जिसे ध्यान में रखकर सात मार्च, 2024 को मौजूदा अध्यादेश लाया गया।


