लखनऊ, इलाहाबाद उच्च न्यायालय की लखनऊ पीठ ने प्रतापगढ़ में उत्तर प्रदेश पुलिस के विशेष कार्यबल (एसटीएफ) की हिरासत में एक व्यक्ति की मौत के मामले की न्यायिक जांच के आदेश दिए हैं।
उच्च न्यायालय ने 14 अगस्त के अपने आदेश में कहा कि पोस्टमार्टम रिपोर्ट में मृतक के शरीर पर मृत्यु से पहले लगी चोटों का उल्लेख है। अदालत ने कहा कि व्यक्ति के परिजनों ने विशेष रूप से आरोप लगाया है कि उसकी मौत एसटीएफ कर्मियों द्वारा यातना दिए जाने के कारण हुई।
अदालत ने कहा कि ऐसे में, दंड प्रक्रिया संहिता (सीआरपीसी) की धारा 176(1-ए) के तहत न्यायिक जांच ज़रूरी है।
न्यायमूर्ति राजेश सिंह चौहान और न्यायमूर्ति राम मनोहर नारायण मिश्रा की खंडपीठ ने प्रतापगढ़ के जिला एवं सत्र न्यायाधीश को निर्देश दिया कि वह मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट (सीजेएम) को न्यायिक जांच करने के निर्देश दें।
खंडपीठ ने कहा कि आदेश की प्रमाणित प्रति प्रस्तुत होने के छह सप्ताह के भीतर जांच पूरी की जाए और रिपोर्ट 27 अक्टूबर, 2026 को सीलबंद लिफाफे में अदालत के समक्ष पेश की जाए।
यह आदेश एक आपराधिक रिट याचिका पर दिया गया। याचिकाकर्ता ने प्रतापगढ़ के संगीपुर थाने में 18 मार्च, 2024 को भारतीय दंड संहिता की धारा 302 (हत्या) के तहत दर्ज मामले की जांच केंद्रीय अन्वेषण ब्यूरो (सीबीआई) या किसी अन्य स्वतंत्र एजेंसी को सौंपने का अनुरोध किया था।
इससे पहले हिरासत में मौत का आरोप सामने आने पर अदालत ने प्रतापगढ़ के पुलिस अधीक्षक को धारा 176(1-ए) के अनुपालन पर एक व्यक्तिगत हलफनामा दाखिल करने का निर्देश दिया था।
इसके बाद राज्य सरकार ने बताया था कि मामला न्यायिक जांच के लिए पुलिस अधीक्षक को भेजा गया है, लेकिन बाद की रिपोर्ट से स्पष्ट हुआ कि धारा 176(1-ए) के तहत कोई न्यायिक जांच वास्तव में हुई ही नहीं।
उच्च न्यायालय ने यह भी कहा कि एसडीएम सदर, प्रतापगढ़ ने 16 अगस्त, 2024 को जांच की थी और मेडिकल रिपोर्ट के हवाले से मौत को हृदय रोग के कारण स्वाभाविक बताया था, जबकि पोस्टमार्टम रिपोर्ट में मृतक के शरीर पर मृत्यु-पूर्व चोटों का उल्लेख है।
खंडपीठ ने कहा कि सीआरपीसी की धारा 176(1-ए) के अनुसार जब किसी व्यक्ति की मौत पुलिस हिरासत में या मजिस्ट्रेट या अदालत द्वारा अधिकृत किसी अन्य हिरासत में होती है, तो क्षेत्राधिकार रखने वाले न्यायिक मजिस्ट्रेट द्वारा जांच की जानी चाहिए।










