अयोध्या, मोहर्रम का मुक़द्दस महीना शुरू होते ही जनपद अयोध्या के मवई कस्बे में ताज़िया कलाकृति के हुनर की चर्चा चारों और सुनाई देने लगती है। जनपद अयोध्या के ब्लॉक मवई क्षेत्र के मवई, नेवरा के ताजिया कारीगर इन दिनों दिन-रात एक कर मेहनत के साथ ताज़ियों को आख़िरी शक्ल देने में जुटे हुए हैं।
बरसों पुरानी इस फ़नकारी से जुड़े परिवारों की रोज़ी-रोटी भी इसी से जुड़ी हुई है। पूरे साल की माली ज़रूरतों का बड़ा हिस्सा इन्हीं दिनों की आमदनी से पूरा होता है। अपनी बेहतरीन कारीगरी, बारीक नक़्क़ाशी और ख़ूबसूरत डिज़ाइनों के लिए मशहूर कस्बा रुदौली व मवई इस साल भी ताज़िया कला का अहम मरकज़ बना हुआ है।
यहां तैयार होने वाले ताज़िए जनपद अयोध्या ही नहीं, बल्कि आसपास के कई ज़िलों में भी अपनी अलग पहचान रखते हैं। दूर-दराज़ के गांवों और कस्बों से लोग अपनी पसंद और रिवायत के मुताबिक़ पहले ही ताज़ियों का ऑर्डर दे देते हैं।
पुश्तैनी विरासत को सहेज रहे हैं कारीगर मशहूर ताज़िया कारीगर अबू मोहम्मद ने बताया कि ताज़िया बनाने का यह फ़न उन्हें अपने बुज़ुर्गों से विरासत में मिला है। उन्होंने कहा, “यह सिर्फ़ हमारा पेशा नहीं, बल्कि हमारे बुज़ुर्गों की अमानत और हमारी पहचान है। बचपन से ही हमने अपने वालिद और बुज़ुर्गों से यह हुनर सीखा है और आज भी पूरी मेहनत, लगन और अकीदत के साथ इस रिवायत को आगे बढ़ा रहे हैं।”
सरकारी गाइडलाइन का रखा जा रहा पूरा ध्यान उन्होंने बताया कि हुकूमत और इंतिज़ामिया की ओर से जारी गाइडलाइन का पूरी तरह ख़याल रखते हुए ताज़ियों का निर्माण किया जा रहा है। ताज़ियों की ऊंचाई, चौड़ाई और अन्य तय मानकों का पूरी तरह पालन किया जाता है। उन्होंने कहा, “हुकूमत की गाइडलाइन पर अमल करना हम सबकी ज़िम्मेदारी है। हमारी कोशिश रहती है कि किसी तरह की शिकायत का मौक़ा न मिले।
अबू मोहम्मद ने बताया कि मोहर्रम शुरू होने से पहले ही मुख़्तलिफ़ गांवों और कस्बों से ताज़ियों के ऑर्डर मिलने शुरू हो जाते हैं। हर ताज़िया लोगों की पसंद और स्थानीय रिवायत के मुताबिक़ तैयार किया जाता है, जिसमें महीनों की मेहनत, बारीक फ़नकारी और ख़ास सजावट शामिल होती है। उन्होंने कहा कि बदलते दौर में भी मवई के कारीगर अपनी पुश्तैनी कला को ज़िंदा रखने के लिए लगातार कोशिश कर रहे हैं। नई पीढ़ियों को भी इस विरासत से जोड़ने का प्रयास किया जा रहा है, ताकि यह तारीखी फ़न आने वाले वक़्त में भी अपनी पहचान बरक़रार रख सके।
इलाक़े के लोगों का कहना है कि मवई की ताज़िया कला यहां की तहज़ीबी विरासत का अहम हिस्सा है। यहां के कारीगरों का हुनर सिर्फ़ मज़हबी अकीदत का इज़हार नहीं, बल्कि भारतीय पारंपरिक फ़नकारी की शानदार मिसाल भी है। यही वजह है कि मवई में तैयार होने वाले ताज़िए हर साल अपनी ख़ूबसूरती, नफ़ासत और बेहतरीन कारीगरी की वजह से लोगों की तवज्जो का मरकज़ बने रहते हैं।










