लखनऊ, इलाहाबाद हाईकोर्ट की लखनऊ बेंच ने भारतीय दंड संहिता (IPC) की धारा 307 से जुड़े एक गंभीर आपराधिक मामले में दोषी ठहराए गए राम आशीष को महत्वपूर्ण राहत प्रदान की है। कोर्ट ने अपील लंबित रहने तक उनकी सजा को निलंबित करते हुए जमानत पर रिहा करने का आदेश जारी किया है। यह फैसला न्यायमूर्ति राम मनोहर नारायण मिश्रा द्वारा 9 जनवरी 2026 को पारित किया गया।
ट्रायल कोर्ट ने राम आशीष को IPC की धाराओं 307/34, 323/34, 324/34 और 325/34 के तहत दोषी करार देते हुए अधिकतम 10 वर्ष की कठोर कारावास की सजा सुनाई थी, साथ ही 10,000 रुपये का जुर्माना भी लगाया गया था। ये सजाएं एक साथ चलने का आदेश दिया गया था। मामला अंबेडकर नगर जिले के अहिरौली थाना क्षेत्र से जुड़ा है, जहां अपराध संख्या 57/2020 के तहत मुकदमा दर्ज किया गया था।
मामले की पृष्ठभूमि
अभियोजन पक्ष के अनुसार, घटना 6 मार्च 2020 को रात करीब 11 बजे की है। शिकायतकर्ता राम बहादुर वर्मा ने आरोप लगाया था कि आरोपी द्वारिका प्रसाद (जो अब दिवंगत हो चुके हैं), राम आशीष और सगुन उर्फ परमीत कुमार ने उनके छोटे भाई प्रमोद कुमार के घर का दरवाजा तोड़कर घुसपैठ की। आरोपियों ने प्रमोद को लात-घूसों से पीटा और उन्हें घसीटते हुए गांव के बाहर नहर के पास ले जाकर कुल्हाड़ी, लोहे की रॉड, आरी और लाठी से हमला किया। इस हमले में प्रमोद को गंभीर चोटें आईं, जिन्हें पहले जिला अस्पताल ले जाया गया और फिर मेयो अस्पताल, लखनऊ रेफर कर दिया गया। घायल ने बताया कि वह 5-6 दिनों तक अस्पताल में भर्ती रहे।FIR अगले दिन 7 मार्च 2020 को दर्ज की गई। ट्रायल कोर्ट ने 12 दिसंबर 2024 को राम आशीष को दोषी ठहराया, जबकि सह-अभियुक्त द्वारिका प्रसाद की मौत हो चुकी थी और एक अन्य आरोपी को जांच के दौरान बरी कर दिया गया था।
हाईकोर्ट में दोषी राम आशीष की ओर अधिवक्ता अभिनव श्रीवास्तव द्वारा यह दलील दी गई कि वह सजा के बाद केवल कुछ महीनों से जेल में है और मामले में कई गंभीर कानूनी प्रश्न हैं, जिन पर अपील में विस्तृत सुनवाई आवश्यक है।
बचाव पक्ष ने अदालत का ध्यान इस ओर दिलाया कि—
• घायल का मेडिकल घटना के 5-6 दिन बाद हुआ है जिससे यह स्पष्ट है कि चोटें ऐसी नही हो सकती जिससे मृत्यु होना संभव हो |
• पुलिस द्वारा केवल गहदला और आरी की बरामदगी की गई जिसकी बरमदगी खुली जगह से की गई, बिना किसी गवाह के मौजूदगी में की गई, और ना ही किसी हथियार का एफएसएल कराया गया, जो बरामद हुए हथियार पर संदेह उत्पन्न करता है |
• चोटाहील के शरीर पर सारे घाव सिले हुए थे जिससे चोट की प्रकृति समझना असंभव है, कोई भी मेडिको लीगल केस डायरी के साथ नहीं लगाया गया था, जिससे यह समझना असंभव है की यह् चोट किस तरह के हथियार से आ सकती है, साथ ही साथ ये भी नहीं समझा जा सकता कि यह चोट गंभीर है या साधारण |
• विवेचक द्वारा घटनास्थल से ना तो कोई टूटा हुआ दरवाज़ा बरामद किया गया, ना ही खून आलूदा मिट्टी, या घटनास्थल से कोई चप्पल जूता, जिससे स्पष्ट है यह मुक़दमा रंजिशन लिखवाया गया था |
हाईकोर्ट का निष्कर्ष
सभी तथ्यों, परिस्थितियों और साक्ष्यों पर विचार करते हुए हाईकोर्ट ने पाया कि—
चोटाहिल के बयान विरोधाभासी हैं
दोषी पर कोई विशिष्ट भूमिका नहीं दर्शायी गई और सारे अभियुक्तों पर घटना में एक समान साधारण आरोप लगाया गया।
चोटों की प्रकृति भी इंजरी रिपोर्ट में नहीं दर्शायी गई।
अभियुक्त ट्रायल के दौरान जमानत पर था और उसने कोई दुरुपयोग नहीं किया।
अपील की सुनवाई में काफी समय लगने की संभावना है।
मामले में कानूनी प्रश्न गहन विचार योग्य हैं,इन परिस्थितियों में न्यायालय ने कहा कि बिना मेरिट पर अंतिम राय व्यक्त किए, अभियुक्त को सजा निलंबन का लाभ दिया जाना न्यायसंगत होगा।